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बचपन में होने वाले कैंसर के लिए हेमटोपोइएटिक सेल ट्रांसप्लांट

आमतौर पर बोन मैरो ट्रांसप्लांट, स्टेम सेल ट्रांसप्लांट या hsct के रूप में जाना जाता है

हेमटोपोइएटिक सेल ट्रांसप्लांट क्या है?

हेमटोपोइएटिक सेल ट्रांसप्लांट एक चिकित्सा प्रक्रिया है जिसका उपयोग बचपन में होने वाले कैंसर सहित कई प्रकार की बीमारियों के इलाज के लिए किया जाता है। यह क्षतिग्रस्त या खराब खून बनाने वाली (हेमटोपोइएटिक) कोशिकाओं को स्वस्थ खून बनाने वाली कोशिकाओं के साथ प्रतिस्थापित करता है।

चूंकि खून बनाने वाली कोशिकाओं का मुख्य स्रोत बोन मैरो है, इसलिए प्रक्रिया को पारंपरिक रूप से बोन मैरो ट्रांसप्लांट कहते हैं। धीरे-धीरे इस क्षेत्र में विकास के साथ-साथ इसे हेमेटोपोएटिक सेल ट्रांसप्लांट कहा जाना लोकप्रिय हो गया। इन शब्दों को अक्सर एक-दूसरे के स्थान पर उपयोग किया जाता है। कुछ लोग इस प्रक्रिया को स्टेम सेल ट्रांसप्लांट भी कह सकते हैं।

प्रत्यारोपण से बचपन में होने वाले कुछ कैंसर का सफलतापूर्वक इलाज किया जा सकता है, लेकिन इसके गंभीर दुष्प्रभाव और देरी से प्रभाव हो सकते हैं। इस विकल्प पर ध्यान से विचार करना चाहिए। प्रत्यारोपण करवाना कोई आसान प्रक्रिया नहीं है। यह रोगी और परिवार के देखभालकर्ता, दोनों पर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रभाव डाल सकता है। लेकिन इस दौरान रोगियों और परिवारों की सहायता करने के लिए प्रत्यारोपण देखभाल टीम के कई लोग मौजूद रहेंगे। कई बच्चे और किशोर जिनके प्रत्यारोपण हो चुके हैं, वे अब सक्रिय कैंसर मुक्त जीवन जी रहे हैं।

प्रत्यारोपण के दो मूल प्रकार हैं: एलोजेनिक (खून बनाने वाली कोशिकाएं किसी दान देने वाले से ली जाती हैं) और ऑटोलॉगस (रोगी की स्वयं की कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है)। रोगी खून देने की तरह नस के माध्यम से दाता से कोशिकाएं लेता है। कोशिकाएं ब्लड स्ट्रीम से होकर लंबी हड्डियों के केंद्र तक जाती हैं। प्रत्यारोपण की गई कोशिकाओं की मदद से रोगी, स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं, सफेद रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स को बनाता है।

प्रत्यारोपण के दो मूल प्रकार हैं: एलोजेनिक (खून बनाने वाली कोशिकाएं किसी दान देने वाले से ली जाती हैं) और ऑटोलॉगस (रोगी की स्वयं की कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है)। रोगी ब्लड ट्रांसफ़्यूजन की तरह नस के माध्यम से दाता से कोशिकाएं लेता है। कोशिकाएं ब्लड स्ट्रीम से होकर लंबी हड्डियों के केंद्र तक जाती हैं। ट्रांसप्लांट की गई कोशिकाओं की मदद से रोगी, स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाओं, सफेद रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स को बनाता है।

बोन मैरो और खून बनाने वाली कोशिकाओं की भूमिका

बोन मैरो शरीर की अधिकांश हड्डियों के केंद्र में एक नरम, स्पंज जैसी सामग्री होता है। बड़ी संख्या में खून बनाने वाली (हेमटोपोइएटिक) कोशिकाएं बोनमैरो में रहती हैं।

हेमटोपोइएटिक कोशिकाएं अन्य सभी रक्त कोशिकाओं की जनक हैं। परिपक्व होकर ये कोशिकाएं बनती हैं और आगे चलकर ये निम्नलिखित बनती हैं:

  • लाल रक्त कोशिकाएं (जो ऑक्सीजन ले जाती हैं)
  • प्लेटलेट्स (जो खून जमने में मदद करते हैं)
  • सफेद रक्त कोशिकाएं (जो संक्रमण से लड़ती हैं)

बोनमैरो, रक्त कोशिका के कारखाने की तरह काम करता है, लगातार नई हेमटोपोइएटिक कोशिकाएं बनाता है ताकि खून में लाल रक्त कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स अच्छे से अपना काम कर सकें।

इस चित्र में अंदर के दृश्य के साथ एक लंबी हड्डी को दिखाया गया है, जो बोनमैरो और खून बनाने वाली स्टेम कोशिकाएं दर्शा रहा है। यही सफेद रक्त कोशिका, लाल रक्त कोशिका और प्लेटलेट्स बन जाते हैं।

सभी लाल रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स साथ ही लगभग 70 प्रतिशत सफेद रक्त कोशिकाएं, बोन मैरो में बनती हैं। (अन्य 30 प्रतिशत तिल्ली / प्लीहा, लसिका ग्रंथि और बाल्यग्रन्थि से बनती हैं।)

हेमटोपोइएटिक कोशिकाओं की बहुत कम संख्या पेरिफ़ेरल (परिसंचारी) खून में पाई जा सकती है। गर्भनाल रक्त भी खून बनाने वाली कोशिकाओं का एक स्रोत है।

प्रत्यारोपण का लक्ष्य निम्नलिखित है:

  • रोगी के कैंसर को नष्ट करने के लिए उच्चस्तरीय कीमोथेरेपी और / या रेडिएशन दें।
  • दाता कोशिकाओं की अस्वीकृति (उपरोप अस्वीकृति) को रोकें।
  • रोगी की रक्त कोशिकाओं को स्वस्थ दाता कोशिकाओं से बदलें जो कैंसर कोशिकाओं से लड़ेंगी और उन्हें नष्ट करेंगी।

बचपन में होने वाले कैंसर का प्रत्यारोपण के ज़रिए इलाज

बचपन में होने वाले कैंसर में, प्रत्यारोपण मुख्य रूप से ल्यूकेमिया (खून का कैंसर) के इलाज के लिए किया जाता है, आमतौर पर जब कैंसर के लिए मानक इलाज विफल हो जाता है। खून और बोन मैरो का कैंसर ल्यूकेमिया से शरीर में क्षतिग्रस्त सफेद रक्त कोशिकाओं का उत्पादन होने लगता है, जिससे रोगी बहुत बीमार हो जाता है।

प्रत्यारोपण कभी-कभी अन्य कैंसर के इलाज के लिए भी किया जाता है। उदाहरण के लिए न्यूरोब्लास्टोमा, मल्टीपल मायलोमा, आवर्तक ईविंग सारकोमा और आवर्तक विल्म्स ट्यूमर

कैंसर के ऐसे रोगियों के इलाज के लिए भी प्रत्यारोपण का उपयोग किया जा सकता है जिसमें नरम ऊतक या मस्तिष्क के ट्यूमर शामिल होते हैं, जिनकी बीमारी का इलाज करने के लिए कीमोथेरेपी या रेडिएशन की बहुत अधिक खुराक की आवश्यकता होती है।

प्रत्यारोपण के प्रकार

प्रत्यारोपण दो प्रकार के होते हैं:

  • एलोजेनिक, जिसमें खून बनाने वाली कोशिकाएं किसी दाता से ली जाती हैं।
  • ऑटोलॉगस, जिसमें रोगी की अपनी कोशिकाओं का उपयोग किया जाता है। 
  1. एलोजेनिक प्रत्यारोपण में किसी अन्य व्यक्ति की स्वस्थ कोशिका से, क्षतिग्रस्त या नष्ट रक्त कोशिकाओं को बदला जाता है। ये कोशिकाएं दाता या गर्भनाल रक्त से आ सकती हैं। दाता एक भाई-बहन, परिवार का कोई अन्य सदस्य या कोई अन्य दाता हो सकता है।

    खून बनाने वाली कोशिकाओं को दाता के बोन मैरो, गर्भनाल रक्त या सतही (परिसंचारी) खून से लिया जाता है।

    प्रत्यारोपण कंडीशनिंग

    दाता कोशिकाओं को प्राप्त करने वाले रोगी को उसकी प्रतिरक्षा प्रणाली को दबाने के लिए चिकित्सा मिलेगी। इस थेरेपी को प्रतिरक्षा कम करने का उपचार कहा जाता है। इसमें उच्च खुराक की कीमोथेरेपी की जाती है, रेडिएशन के साथ या इसके बिना। प्रतिरक्षा कम करने का उपचार कैंसर से लड़ता है, रोगी की मौजूदा प्रतिरक्षा प्रणाली को नष्ट कर देती है और रोगी के बोन मैरो में दाता की कोशिकाओं के बढ़ने के लिए जगह बनाती है।

    दाता सेल इंफ़्यूजन

    खून देने की तरह ही नस के माध्यम से दाता से कोशिकाएं ली जाती हैं। कोशिकाएं ब्लड स्ट्रीम से होकर लंबी हड्डियों के केंद्र तक जाती हैं। इसकी मदद से रोगी, स्वस्थ लाल रक्त कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स बनाता है।

    प्रशामक देखभाल

    रोगी को रक्त उत्पादों, जीवाणु नाशक दवाई, एंटी-वायरल दवाओं के साथ प्रशामक देखभाल दी जाती है और कुछ मामलों में, ग्राफ्ट वर्सेज होस्ट डिसीज़ (जीवीएचडी) को रोकने में मदद करने के लिए प्रतिरक्षा कम करने वाली दवाई दी जाती है, ताकि वे ठीक हो सकें।  

  2. ऑटोलॉगस प्रत्यारोपण, कैंसर के इलाज के लिए आवश्यक रेडिएशन के साथ या उसके बिना कीमोथेरेपी की उच्च खुराक लेने के बाद लाल रक्त कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स बनाने की अपनी क्षमता को बहाल करने के लिए रोगी की अपनी कोशिकाओं का उपयोग करता है। बाद में उपयोग के लिए, पहले ही सतही (परिसंचारी) खून या बोन मैरो से रोगी की कोशिकाओं को एकत्रित किया जाता है और क्रायोप्रीज़र्व (जमे हुए) करके रख लिया जाता है।

    कोशिकाओं को कैसे एकत्र किया जाता है

    रोगी से खून बनाने वाली कोशिकाओं को इकट्ठा करने के दो तरीके हैं: एफरेसिस या बोन मैरो स्टेम सेल प्राप्त करना।

    एफरेसिस

    उन्हें ग्रैनुलोसाइट्स कॉलोनी-उत्तेजक कारक (G-CSF) के बाद कीमोथेरेपी का उपयोग करके बोनमैरो से सतही ब्लडस्ट्रीम में लाया जा सकता है। कभी-कभी रोगी सिर्फ़ G-CSF प्राप्त करने के बाद ही इन कोशिकाओं को जुटा सकते हैं। फिर रोगी इन कोशिकाओं को इकट्ठा करने के लिए एफरेसिस नामक एक प्रक्रिया से गुजरेगा।

    बोन मैरो स्टेम सेल प्राप्त करना

    बोनमैरो से सीधे खून बनाने वाली कोशिकाओं को इकट्ठा करने के लिए बोन मैरो स्टेम सेल प्राप्त करने की प्रक्रिया भी की जा सकती है। जब सफेद रक्त कोशिका की गिनती सामान्य स्तर तक पहुंच जाती है, तो यह किसी भी समय किया जा सकता है।

    कोशिकाओं को एफरेसिस या बोन मैरो स्टेम सेल प्राप्त करने की प्रक्रिया से एकत्र किए जाने के बाद, उन्हें जमा कर रखा जाता है, ताकि भविष्य में जब चिकित्सा टीम प्रत्यारोपण के लिए कहे तब उनका उपयोग किया जा सके।

    प्रत्यारोपण होने से पहले, रोगी की संक्रामक रोगों के लिए जांच की जाएगी और यह भी कि वह चिकित्सा की दृष्टि से प्रत्यारोपण के लिए सक्षम है।

    प्रत्यारोपण के दौरान, रोगी को कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए, रेडिएशन के साथ या इसके बिना कीमोथेरेपी की उच्च खुराक दी जाती है, जिससे रोगी की रक्त कोशिकाओं को बनाने की क्षमता खत्म हो जाती है। प्रत्यारोपण के बिना, रोगी खुद से लाल रक्त कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स फ़िर से नहीं बना सकता।

    नस के माध्यम से, रोगी खुद की कोशिकाओं को, खून देने की तरह ही वापस प्राप्त करता है। कोशिकाएं ब्लड स्ट्रीम से होकर लंबी हड्डियों के केंद्र तक जाती हैं। इसकी मदद से रोगी, खुद की लाल रक्त कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स बनाता है।

    जब रोगी, खून बनाने वाली कोशिकाओं के काम करने का इंतज़ार करते हैं उस दौरान रोगी को रक्त उत्पाद, एंटीबायोटिक्स और एंटी-वायरल दवाएं दी जा सकती हैं।

प्रत्यारोपण के लिए आवश्यक परीक्षण

प्रत्यारोपण एक शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण चिकित्सा प्रक्रिया है। सबसे पहले चिकित्सीय टीम यह देखेगी कि क्या रोगी प्रत्यारोपण के लिए सक्षम है। इसके लिए टीम रोगी की इन चीजों पर गौर करेगी:

  • उम्र
  • सामान्य शारीरिक स्थिति
  • रोग की पहचान करना
  • पहले के इलाज का इतिहास
  • दाता की उपलब्धता, जब तक कि रोगी की स्वयं की कोशिकाओं का उपयोग नहीं किया जाता है
यह सुनिश्चित करने के लिए कि रोगी प्रत्यारोपण को सहन कर सकता है, उसके दिल, फेफड़े, गुर्दे और अन्य महत्वपूर्ण अंगों पर परीक्षण होंगे। इस तस्वीर में, एक प्रदाता इकोकार्डियोग्राम परीक्षण के ज़रिए रोगी के दिल की जांच कर रहा है।

दिल के काम करने की स्थिति को मापने के लिए एक इकोकार्डियोग्राम (इको) जैसे हृदय परीक्षण का उपयोग किया जा सकता है।

यह सुनिश्चित करने के लिए कि रोगी प्रत्यारोपण को सहन कर सकता है, उसके दिल, फेफड़े, गुर्दे और अन्य महत्वपूर्ण अंगों पर परीक्षण होंगे। इन जांचों में शामिल हैं:

  • दिल के काम करने की स्थिति को मापने के लिए एमयूजीए स्कैन/इकोकार्डियोग्राम/इकेजी
  • फेफड़े के स्वास्थ्य को मापने के लिए फेफड़ो की क्षमता का परिक्षण
  • फेफड़ों की समस्याओं और संक्रमण की जांच के लिए छाती का एक्स-रे/सीटी स्कैन
  • खून की गिनती और गुर्दे के कार्य, जिगर के कार्य, यकृत की कार्यप्रणाली और संक्रामक रोगों और संक्रामक रोगों के लिए पिछले संपर्क को मापने के लिए खून परीक्षण और पेशाब की जाँच
  • रोग की स्थिति की जांच करने के लिए परीक्षण
  • शारीरिक जांच और चिकित्सकीय इतिहास
  • दंत परीक्षण

अगर पहले उनका परीक्षण नहीं हुआ है, तो रोगी को एक केंद्रीय लाइन लगाई जाएगी, ताकि उन्हें बार-बार सुई न लगानी पड़े।

रोगी परिवार, भावनात्मक स्वास्थ्य पर चर्चा करने के लिए एक सामाजिक कार्यकर्ता या मनोवैज्ञानिक से भी मिलेंगे। साथ ही, बीमा की रकम मिलने और वित्तीय मुद्दों में मदद पाने के लिए वित्तीय परामर्शदाता से भी मिलेंगे।

एक दाता खोजना

अस्पताल की प्रत्यारोपण टीम दाता खोजने में मदद करेगी। सगे भाई-बहन पहले विकल्प होते हैं क्योंकि दाता और रोगी के हेमटोपोइएटिक कोशिकाओं में समान आनुवंशिक मार्कर होने चाहिए। ये मार्कर प्रोटीन हैं जिन्हें मानवीय ल्यूकोसाइट एंटीजन (एचएलए) कहा जाता है। यह निर्धारित करना कि कोई एचएलए मैच है या नहीं, उसे एचएलए परीक्षण की आवश्यकता होती है, जिसमें रोगी और संभावित दाता के खून का नमूना लिया जाता है। कुछ मामलों में, इस परीक्षण के लिए एक आंतरिक गाल के स्वैब के नमूना का उपयोग किया जा सकता है। कोशिकाओं को परीक्षण के लिए एक प्रयोगशाला में भेजा जाता है।

चूंकि ये आनुवंशिक मार्कर माता-पिता से विरासत में मिलते हैं, इसलिए भाई या बहन के मैच होने की संभावना सबसे अधिक होती है। अगर रोगी और भाई-बहन के जैविक माता-पिता समान हैं, तो प्रत्येक भाई और बहन से रोगी को एचएलए मैच होने की 25 प्रतिशत संभावना होती है। इस वजह से, लगभग 70% रोगियों को मैच भाई-बहन नहीं मिलते।

अगर भाई-बहन मैच नहीं होते, तो देखभाल टीम नेशनल डोनर मैरो प्रोग्राम के Be the Match® रजिस्ट्री के माध्यम से दाता या कॉर्ड ब्लड यूनिट (अगर प्रत्यारोपण सेंटर कॉर्ड ब्लड प्रत्यारोपण करती है) खोजेगी। लगभग 30 प्रतिशत रोगियों को असंबंधित दाता के मैच मिलते हैं।

अगर पूरा सही मैच नहीं मिल सकता है, तो चिकित्सक एक बेमेल दाता का उपयोग करने का सुझाव दे सकता है, जो ऐसा दाता होगा जो पूरी तरह मैच नहीं होगा, लेकिन उसका एचएलए कुछ हद तक मैच होगा। बेमेल दाता प्रत्यारोपण काफी सामान्य हैं, और कई इसमें सफल हैं।

उन रोगियों के लिए जो एक उपयुक्त दाता नहीं पा सकते हैं, कुछ मामलों में “आधा मैच” वाले परिवार के सदस्य के बोन मैरो या पेरिफ़ेरल हेमटोपोइएटिक कोशिकाओं का उपयोग करना संभव है। इस तरह के प्रत्यारोपण को हापलॉआइडेंटिकल (आधा-मैच) बोन मैरो ट्रांसप्लांट कहा जाता है। 

जांच

दाताओं को दाता बनाने के लिए चिकित्सकीय रूप से सक्षम होना चाहिए। दाता केंद्र, Be the Match के माध्यम से, संभावित दाता की कुछ स्वास्थ्य स्थितियों की जांच करेगा:

  • HIV/ AIDS
  • एडिसन के रोग
  • गंभीर गठिया, जैसे संधिशोथ
  • गंभीर अस्थमा
  • ऑटोइम्यून रोग (स्वप्रतिरक्षित रोग) जैसे मल्टीपल स्केलेरोसिस, सिस्टमिक ल्यूपस, क्रॉनिक थकान सिंड्रोम या फ़िब्रोमाइल्जीया
  • पुरानी, गंभीर पीठ, कूल्हे, गर्दन या रीढ़ की समस्याएं या सर्जरी
  • हीमोफिलिया, अप्लास्टिक एनीमिया (बीमारी जिसमें रक्त बनना बंद हो जाता है) या एक से अधिक गहरी शिराओं के खून का थक्का जमने जैसी रक्तस्राव की समस्या।
  • मस्तिष्क की चोट या सर्जरी
  • श्वास संबंधी समस्याएं जैसे क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी बीमारी, वातस्फीति, स्लीप एपनिया या सिस्टिक फाइब्रोसिस
  • कैंसर
  • मधुमेह
  • मिरगी
  • दिल की बीमारी, दिल का दौरा या हार्ट सर्जरी का इतिहास
  • मोनोन्यूक्लिओसिस या साइटोमेगालोवायरस (CMV) के कारण होने वाला पीलिया
  • गुर्दे की गंभीर या क्रॉनिक समस्याएं
  • जिगर की बीमारी जैसे हेपेटाइटिस, सिरोसिस या विल्सन रोग
  • क्रॉनिक लाइम रोग
  • गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संबंधी बीमारियां जैसे कि सिज़ोफ्रेनिया
  • पहले कभी अंग या ऊतक प्रत्यारोपण
  • गर्भावस्था
  • गंभीर सोरायसिस
  • तपेदिक (टी.बी.)
  • सामान्य या क्षेत्रीय एनेस्थिसिया (बेहोशी की दवा) से समस्याएं

दाता कोशिकाओं का संग्रह

खून बनाने वाली कोशिकाओं को बोन मैरो, सतही (परिसंचारी) खून से और दान किए गए गर्भनाल के खून से एकत्र किया जा सकता है। इस प्रक्रिया को स्टेम सेल प्राप्त करना कहा जाता है।

  1. अगर प्रत्यारोपण के लिए कोशिकाओं को बोनमैरो से लिया जाता है, तो संग्रह प्रक्रिया को "बोन मैरो स्टेम सेल प्राप्त करना" कहा जाता है। दाता को या तो सामान्य एनेस्थिसिया दिया जाता है, जिससे प्रक्रिया के दौरान व्यक्ति सो जाता है या क्षेत्रीय एनेस्थिसिया दिया जाता है, जिसकी वजह से कमर से नीचे का हिस्स सुन्न हो जाता है। पेल्विक (कूल्हे) की हड्डी के ऊपर और बोन मैरो में सुई लगाई जाती है, ताकि हड्डी से खून बनाने वाली कोशिकाओं को खींचा जा सके। बोन मैरो स्टेम सेल प्राप्त करने की प्रक्रिया में लगभग एक घंटे का समय लगता है।

    प्राप्त किए गए स्टेम सेल को बोनमैरो को फिर, खून और हड्डी के टुकड़ों को निकालने के लिए संसाधित किया जाता है। ऑटोलॉगस प्रत्यारोपण के लिए, बोनमैरो से कटी हुई कोशिकाओं को एक परिरक्षक के साथ जोड़ा जा सकता है। साथ ही, ज़रूरत पड़ने तक कोशिकाओं को जीवित रखने के लिए जमा कर रखा जा सकता है। इस तकनीक को क्रायोप्रिज़र्वेशन के नाम से जाना जाता है। खून बनाने वाली कोशिकाओं को कई वर्षों तक क्रायोप्रिज़र्व किया जा सकता है।

  2. अगर प्रत्यारोपण के लिए आवश्यक खून बनाने वाली कोशिकाओं को ब्लड स्ट्रीम से लिया जाता है, तो प्रक्रिया को एफरेसिस या ल्यूकेफ़ेरिस कहा जाता है। एफरेसिस से पहले कई दिनों तक, दाता या रोगी को ग्रैनुलोसाइट्स कॉलोनी उत्तेजक कारक-G-CSF नामक दवा दी जा सकती है, ताकि बोनमैरो को और अधिक हेमटोपोइएटिक कोशिकाओं को बनाने के लिए उत्तेजित किया जा सके और उन्हें ब्लड स्ट्रीम में छोड़ा जा सके।

    एफरेसिस में, खून को हाथ की बड़ी नस के माध्यम से या एक केंद्रीय शिरापरक कैथेटर से निकाला जाता है (एक लचीली ट्यूब जो गर्दन, छाती या कमर क्षेत्र में बड़ी नस में रखी जाती है)। खून, एक मशीन के माध्यम से जाता है जो हेमटोपोइएटिक कोशिकाओं को निकाल देता है। शेष खून फिर दाता को लौटा दिया जाता है। एफरेसिस में आमतौर पर 4 से 6 घंटे लगते हैं।

    ऑटोलॉगस प्रत्यारोपण के लिए, रोगी की एकत्रित कोशिकाएं तब तक जमी रहेंगी जब तक उनकी ज़रूरत न हो। फिर एलोजेनिक प्रत्यारोपण के लिए, डोनर कोशिकाओं को संसाधित किया जाता है और संग्रह के बाद जितनी जल्दी हो सके रोगी को दिया जाता है।

  3. खून बनाने वाली कोशिकाओं को गर्भनाल रक्त से भी लिया जा सकता है। ऐसा होने के लिए, मां को बच्चे के जन्म से पहले एक कॉर्ड ब्लड बैंक से संपर्क करना चाहिए। कॉर्ड ब्लड बैंक अनुरोध कर सकता है कि वह एक प्रश्नावली पूरी करें और छोटा सा ब्लड सैंपल दें।

    कॉर्ड ब्लड बैंक सार्वजनिक या निजी हो सकते हैं। सार्वजनिक कॉर्ड ब्लड बैंक कॉर्ड ब्लड के दान को स्वीकार करते हैं और प्रत्यारोपण की ज़रूरत पड़ने पर दान की गई कोशिकाओं को किसी अन्य व्यक्ति को दे सकते हैं। निजी कॉर्ड ब्लड बैंक परिवार के लिए कॉर्ड ब्लड को संग्रहित करेंगे, ताकि बच्चे या परिवार के किसी अन्य सदस्य को ज़रूरत के समय दिया जा सके। परिवार को कॉर्ड ब्लड के संग्रह और भंडारण के लिए भुगतान करना होगा। 2017 अमेरिकन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स स्टेटमेंट ऑन कॉर्ड ब्लड बैंकिंग फॉर पोटेंशियल फ्यूचर ट्रांसप्लांटेशन ने बताया कि “निजी कॉर्ड ब्लड बैंकों के रखरखाव की लागत और मूल्य, वर्तमान समय में उपयोग के लिए साक्ष्य द्वारा समर्थित नहीं हैं।”

    बच्चे के जन्म के बाद और गर्भनाल को काट दिए जाने के बाद, खून को गर्भनाल और प्लेसेंटा से लिया जाता है। यदि मां सहमत हो जाती है, तो गर्भनाल रक्त को संसाधित किया जाता है और कॉर्ड ब्लड बैंक द्वारा भंडारण के लिए जमाया जाता है।

प्रत्यारोपण कैसे किया जाता है

कई रोगियों को लगता है कि प्रत्यारोपण एक जटिल सर्जिकल प्रक्रिया है, लेकिन प्रत्यारोपण बहुत ही आसान प्रक्रिया है। यह काफी हद तक खून देने जैसा होता है। दाता के सेल एक बैग या सिरिंज में होते हैं जो एक ट्यूब के माध्यम से रोगी की केंद्रीय लाइन से जुड़ा होता है। इसमें कुछ मिनट से कुछ घंटे ही लगते हैं और यह दर्दनाक नहीं होता है।

खून में प्रवेश करने के बाद, हेमटोपोइएटिक कोशिकाएं, बोन मैरो तक जाती हैं, जहां वे विभाजित होने लगती हैं और उत्कीर्णन प्रक्रिया के तहत सफेद रक्त कोशिकाएं, लाल रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स बन जाती हैं। जुड़ाव आमतौर पर 2-4 सप्ताह में होता है (लंबे समय तक अगर स्रोत एक गर्भनाल था।) ऑटोलॉगस (रोगी की स्वयं की कोशिकाओं का उपयोग) प्रत्यारोपण में प्रतिरक्षा प्रणाली को पूरी तरह सही होने में 6 महीने लग सकते हैं या अगर एलोजेनिक (संबंधित या असंबंधित दाता कोशिकाओं का उपयोग करके) प्रत्यारोपण है, तो एक साल लग सकता है।

अस्पताल में रहने के दौरान क्या अपेक्षा करें

  1. रोगियों को अस्पताल में रहते हुए उनके साथ रहने के लिए माता-पिता या अन्य वयस्क परिवार के सदस्य की आवश्यकता होती है, जिन्हें कम से कम 4-6 सप्ताह और शायद लंबे समय तक रहना होगा। रोगियों को अस्पताल के एक विशेष हिस्से में रहना पड़ सकता है जो प्रत्यारोपण वाले रोगियों और शायद उन रोगियों के लिए आरक्षित है जिनके पास प्रतिरक्षा प्रणाली बहुत कम है या नहीं है। संक्रमण नियंत्रण दिशानिर्देश अस्पताल के अन्य क्षेत्रों की तुलना में यहां अलग हैं।

    सबसे अच्छा होता है अगर माता-पिता अपने बच्चे की देखभाल कर सकते हैं, क्योंकि देखभालकर्ता के लिए यह शारीरिक और भावनात्मक दोनों रूप से मुश्किल हो सकता है। अगर माता-पिता दोनों उपलब्ध नहीं हैं, तो परिवार के किसी अन्य सदस्य को साथ रखने की कोशिश करें। पहले ही सोच लें क्योंकि देखभालकर्ता को प्रशिक्षित करना होगा।

    अगर कहीं काम करते हैं, तो माता-पिता को अपने नियोक्ता के साथ मिलकर बोन मैरो ट्रांसप्लांट प्रक्रिया के बारे में बात करनी चाहिए। साथ ही, उन्हें यह भी बताना चाहिए कि बच्चे के प्राथमिक देखभालकर्ता के रूप में उनकी किस लिए ज़रूरत होगी।

  2. अस्पताल में रहने के पहले भाग के दौरान, रोगियों को रेडिएशन के साथ या उसके बिना उच्चस्तरीय कीमोथेरेपी दी जाएगी।

    कीमोथेरेपी (और रेडिएशन अगर उपयोग किया जाता है) कैंसर कोशिकाओं से लड़ता है और साथ ही स्वस्थ दाता कोशिकाओं के लिए जगह भी बनाता है। यह दाता कोशिकाओं की अस्वीकृति को रोकने के लिए रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली को भी कमजोर करता है। संक्रमणों को रोकने के लिए रोगियों को कई सावधानियां बरतनी पड़ती हैं, जैसे अक्सर मास्क पहनना और हाथ धोना।

    इसके अलावा, जो भी रोगी के साथ रह रहा है या जा रहा है, उसकी संभावित संक्रमण और संक्रामक बीमारियों की जांच की जाती है। प्रत्येक प्रत्यारोपण केंद्र अलग है, इसलिए परिवारों को अस्पताल-विशिष्ट नियमों और दिशानिर्देशों के लिए पूछना चाहिए।

    सामान्य रूप से:

    • रोगियों और देखभालकर्ता, परिवार के सदस्य को भर्ती होने से पहले कुछ स्क्रीनिंग मानदंडों को पूरा करना चाहिए और प्रत्यारोपण संक्रमण नियंत्रण दिशानिर्देशों का पालन करना चाहिए।
    • केवल रोगी और परिवार के देखभालकर्ता को रात भर रहने की अनुमति है।
    • सिर्फ़ कुछ खास घंटों में ही मुलाकात की जा सकती है। प्राथमिक देखभालकर्ता को मुलाकात करने वाला नहीं माना जाता है।
    • कमरे में कुछ सीमित संख्या में देखभालकर्ता और मुलाकात करने वाले आ सकते हैं। 
    • भाई-बहनों और असंबंधित आगंतुकों के लिए उम्र बताने की आवश्यकता हो सकती है।
    • सभी देखभालकर्ताओं और आगंतुकों को रोगी के कमरे में प्रवेश करने और निकलने पर अपने हाथ धोने चाहिए।
  3. यह सब पहली बार में डरावना लग सकता है, लेकिन बच्चों को यथासंभव आरामदायक महसूस करने में मदद करने के लिए देखभाल टीम वहां मौजूद रहेगी। रोगियों को घर जैसा माहौल देने के लिए कुछ प्रकार के खिलौने और अन्य सामान ला सकते हैं। शिशु जीवन विशेषज्ञ खेल और क्राफ़्ट जैसी मजेदार चीज़ें दे सकते हैं। पुनर्सुधार थेरेपिस्ट रोगियों को व्यायाम करने और सक्रिय रहने के बारे में बताएंगे।

    परिवार, दोस्तों और सामान्य गतिविधियों से अलग होना मुश्किल हो सकता है, इसलिए बच्चों और किशोरों को टेक्स्ट, सोशल मीडिया, वीडियो चैट, ई-मेल, फ़ोन कॉल और लेटर के माध्यम से दूसरों के संपर्क में रहने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

  4. प्रत्यारोपण के रोगी अस्पताल में रहते हुए स्कूल नहीं जा पाएंगे, लेकिन अगर उन्हें यह महसूस होता है कि वे स्कूल का कुछ काम कर सकते हैं। देखभालकर्ताओं को अपने बच्चे के स्कूल के साथ बात करनी चाहिए और प्रत्यारोपण केंद्र के स्कूल कार्यक्रम या स्कूल संपर्क के साथ भी जुड़ना चाहिए।

कैसे पता करें कि प्रत्यारोपण सफल रहा

चिकित्सक विभिन्न खून की जाँचों के परिणामों का मूल्यांकन करते हैं, ताकि यह पुष्टि की जा सके कि नई रक्त कोशिकाओं का उत्पादन (वृद्धि) हो रहा है और कैंसर वापस नहीं आया है। प्रत्यारोपण के बाद, हर दिन रोगियों का खून लिया जाता है और लैब में इसका परीक्षण किया जाता है। चिकित्सक गिनेंगे कि शरीर में कितनी लाल रक्त कोशिकाएं, सफेद रक्त कोशिकाएं और प्लेटलेट्स हैं। चूंकि ये हर दिन गिने जाते हैं, तो चिकित्सक और रोगी प्रगति का ट्रैक रख सकते हैं। क्योंकि हर कोई अलग है, इसलिए रक्त कोशिकाओं का उत्पादन अलग-अलग समय पर हो सकता है। आमतौर पर इसमें दो सप्ताह से एक महीने तक लगता है। सफ़ेद रक्त कोशिकाएं सबसे पहले बनना शुरू होने वाली होती हैं, इसके बाद लाल रक्त कोशिकाएं और फिर प्लेटलेट्स। रोगी को लाल रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स के ट्रांसफ़्यूजन की आवश्यकता हो सकती है, ताकि जब वे इनके बनने का इंतज़ार करें, तब तक गिनती सही रहे।

बोन मैरो एस्पिरेशन (माइक्रोस्कोप से जांच के लिए एक सुई के माध्यम से बोनमैरो के एक छोटे से नमूने को निकालना) भी चिकित्सकों को यह निर्धारित करने में मदद कर सकता है कि नई खून बनाने वाली कोशिकाएं कितनी अच्छी तरह काम कर रही हैं और कहीं कैंसर वापस तो नहीं आ रहा।

रोगी के अस्पताल छोड़ने के बाद

रोगी के प्रत्यारोपण इकाई से जाने के बाद भी उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर रहती है और उन्हें संक्रमण से लड़ने में कठिनाई होगी। इनमें से कुछ संक्रमण जानलेवा हो सकते हैं। छुट्टी के बाद, रोगियों को उनके साथ घर पर देखभालकर्ता की आवश्यकता होगी जब तक कि उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली सामान्य न हो जाए। इसमें कुछ महीनों से एक वर्ष तक का समय लग सकता है।

  1. अगर परिवार निकट रहता है, तो रोगी घर लौट सकता है। अगर नहीं, तो रोगी के परिवार को अस्पताल के पास एक विशेष आवास सुविधा में रहने की आवश्यकता होगी। पहले कुछ हफ्तों के लिए रोगी को बार-बार अस्पताल आना चाहिए। परिवारों को पूरे दिन रुकने के लिए तैयार रहना चाहिए। रोगी की शारीरिक जांच होगी और परीक्षण और इलाज की आवश्यकता हो सकती है। समय के साथ, रोगियों को तब तक अस्पताल आने की आवश्यकता नहीं होती जब तक कि समस्याएं या जटिलताएं न हों। हर मुलाकात पर, माता-पिता को रोगी की सभी दवाओं को लाना चाहिए।

  2. रोगी को घर जाने के बाद भी, उन्हें संक्रमण के जोखिम के कारण अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है।

    • रोगी तुरंत स्कूल नहीं लौट पाएंगे और उन्हें घर से स्कूल का काम पूरा करने का रास्ता निकलना होगा या तो बच्चे के स्कूल के साथ या अपने स्थानीय स्कूल प्रणाली से होमबाउंड सेवाओं का उपयोग करके।
    • रोगी, किराने की दुकानों, मॉल, फिल्मों, रेस्तरां या पूजा के घरों जैसे सार्वजनिक स्थानों पर नहीं जा सकते।
    • संक्रामक बीमारियों वाले लोगों को रोगी के घर नहीं जाना चाहिए।
    • प्रत्यारोपण देखभाल टीम, परिवार को बताएगी कि रोगी के लिए नई गतिविधियां शुरू करना कब सुरक्षित है।

    रोगी को बताई गई सभी संक्रमण नियंत्रण दिनचर्याएं करते रहनी चाहिए, जब तक कि चिकित्सक यह नहीं कहते हैं कि अब इसे रोकना ठीक है। हर प्रत्यारोपण केंद्र अलग होता है, इसलिए अपने अस्पताल की प्रक्रियाओं का पालन करें।

    सामान्य रूप से:

    • अगर देखभाल टीम कहती है कि ज़रूरत है, तो अस्पताल का दिया मास्क पहनें।
    • दिन में कई बार मुंह धोएं।
    • दिन में 2 बार दांतों को ब्रश करें।
    • दिन में कई बार प्राणायाम करें।
    • रोजाना नहाएं या तौलिए से शरीर पोंछें।
    • अक्सर हाथ धोएं।
    • सर्दी और अन्य बीमारियों के संबंध में मुलाकात करने वाले की जांच करें।
    • सभी सार्वजनिक क्षेत्रों में जाने से बचें।
    • व्यायाम करें और सक्रिय रहें। उचित शारीरिक गतिविधियों के बारे में देखभाल टीम से पूछें।
  3. रोगी कई दवाएं ले रहे होंगे। ये दवाएं रोगी के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन प्रक्रियाओं का पालन करें:

    • समय पर दवाएं लें। देखभालकर्ता को इन दवाओं को हर दिन सही समय पर सही खुराक में रोगी को देना चाहिए। देखभालकर्ता को प्रत्यारोपण क्लिनिक को तुरंत कॉल करना चाहिए, अगर उन्हें समय पर दवाइयां देने में परेशानी हो रही हो या रोगी दवा खाते ही उल्टी कर देता है। अगर रोगी समय पर दवा नहीं लेता है, तो यह उनकी स्थिति को बदतर बना सकता है या जानलेवा संक्रमण पैदा कर सकता है। चिकित्सक या फ़ार्मासिस्ट से बात करें कि अगर रोगी की एक खुराक छूट जाती है, तो क्या करें। कुछ दवाओं के लिए, रोगियों को याद आते ही इसे लेना चाहिए। अन्य दवाओं के लिए, चिकित्सक कह सकता है कि नियमित तरीके से दवा देते रहें और जो छूट गई है उसे छोड़ दें।
    • प्रत्येक दवा कैसे लें, इस पर नज़र रखें। कुछ दवाओं को खाने के साथ लेना होता है। कुछ को खाली पेट लेना हो सकता है।
    • ध्यान रखें कि कब दवा फिर से लेने की ज़रूरत है। खत्म होने से पहले दवा फिर से ले लें।
    • दुष्प्रभावों को समझें। संभावित दुष्प्रभावों के बारे में चिकित्सक या फ़ार्मासिस्ट से पूछें। पता करें कि कौन से दुष्प्रभाव आम हैं और कौन से आपातकालीन स्थिति के चेतावनी संकेत हो सकते हैं।
    • दवाओं को रखने का तरीका जानें। बाथरूम का दवा कैबिनेट आमतौर पर दवाओं को स्टोर करने के लिए सबसे अच्छी जगह नहीं होता है। अक्सर उन्हें रेफ़्रिजरेटर जैसे अंधेरे, ठंडे स्थान पर रखें। फ़ार्मासिस्ट या चिकित्सक से पूछें कि हर दवा को कैसे रखा जाए।
    • जानें कि क्या नहीं खाना-पीना है, कौनसे हर्बल इलाज नहीं करने हैं और बिना पर्ची वाली दवाएं नहीं देनी हैं। कई दवाएं कुछ दवाओं के साथ दिक्कत कर सकती हैं, जिनमें कुछ बिना पर्ची वाली दवाएं और हर्बल थेरेपी भी शामिल हैं। यहां तक कि अंगूर और अंगूर का रस कुछ दवाओं के साथ दिक्कत करते हैं। प्रत्यारोपण टीम से पूछे बिना कोई भी नई दवा, पूरक आहार या खाने की चीज़ शुरू न करें।
    • अगर आप दवाएं नहीं खरीद सकते तो प्रत्यारोपण टीम को बताएं। अगर आपको कभी किसी दवा के लिए भुगतान करने में परेशानी होती है, तो प्रत्यारोपण देखभाल टीम या सामाजिक कार्यकर्ता को तुरंत बताएं। दवा के लिए भुगतान में सहायता के लिए अस्पतालों, दवा कंपनियों और संगठनों के माध्यम से कई कार्यक्रम उपलब्ध हैं।

अस्थायी प्राथमिक देखभालकर्ता की व्यवस्था करना

अगर रोगी का मुख्य देखभाल करने वाला बदलता है, तो तुरंत प्रत्यारोपण क्लिनिक स्टाफ़ को बताएं। पहले से बदलाव की योजना बनाना अच्छा है। प्रत्यारोपण स्टाफ़ सदस्य को हर देखभालकर्ता को प्रशिक्षित करना होगा।

संभावित समस्याएं / दुष्प्रभाव

सबसे गंभीर दुष्प्रभाव और देर से दिखाई देने वाले प्रभाव का कारण बनने वाली दो स्थितियां हैं ग्राफ़्ट रिजेक्शन और ग्राफ़्ट बनाम होस्ट रोग (जीवीएचडी)।

  1. ग्राफ़्ट रिजेक्शन तब होता है जब रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली पहचानती है कि दाता की कोशिकाएं अलग हैं और उन्हें नष्ट कर देती है। चूंकि प्रत्यारोपण के दौरान इस्तेमाल की जाने वाली उच्चस्तरीय कीमोथेरेपी रोगी के खून बनाने वाली कोशिकाओं को नष्ट कर देती है, इसलिए वे अपने आप पुनर्जीवित नहीं हो सकते। जिन रोगियों को ग्राफ़्ट रिजेक्शन का अनुभव होता है, वे काफी बीमार हो सकते हैं और कुछ मामलों में इलाज की जटिलताओं की वजह से मर जाते हैं। ग्राफ़्ट रिजेक्शन को रोकने के लिए, प्रत्यारोपण से पहले प्रतिरक्षा प्रणाली को नष्ट करने के लिए रोगी की रेडिएशन के साथ या बिना कीमोथेरेपी की जाती है। अगर ग्राफ़्ट रिजेक्शन होता है, तो एक और प्रत्यारोपण या इलाज एक विकल्प हो सकता है।

  2. दाता की कोशिकाओं का उपयोग करके प्रत्यारोपण करने में, ग्राफ्ट वर्सेज होस्ट डिसीज़ (जीवीएचडी), एक सामान्य जटिलता है। दाता की कोशिकाओं से प्रत्यारोपण हुए 20 से 50 प्रतिशत रोगियों में प्रत्यारोपण के बाद ग्राफ़्ट वर्सस होस्ट डिसीज़ विकसित होती है। जीवीएचडी उन रोगियों के लिए कोई समस्या नहीं है, जिनका प्रत्यारोपण अपनी खुद की कोशिकाओं से हुआ है। जीवीएचडी की समस्या एलोजेनिक (संबंधित या असंबंधित दाता) प्रत्यारोपण के बाद हो सकती है। यह तब होता है जब दाता की सफेद रक्त कोशिकाएं यह पहचानती हैं कि रोगी का शरीर कोई दूसरा शरीर है। ये सफेद रक्त कोशिकाएं तब रोगी के शरीर में टिशुओं पर हमला करती हैं जैसे कि वे किसी संक्रमण पर हमला कर रहे हों।

    ज़्यादातर मामले हल्के या मध्यम होते हैं और समय के साथ हल हो जाते हैं। हालांकि, जीवीएचडी, अधिक गंभीर, यहां तक कि जानलेवा भी हो सकता है।

    जीवीएचडी को इलाज की तुलना में रोकना ज़्यादा आसान है। निवारक उपायों में आमतौर पर ऐसी दवाएं शामिल होती हैं जो प्रतिरक्षा प्रणाली को कम करती हैं। जैसे कि साइक्लोस्पोरिन, टैक्रोलिमस, मेथोट्रिक्सेट, मायकोफ़ेनोलेट मोफ़ेटिल या प्रत्यारोपण के बाद स्टेरॉयड। इन्हें देने से पहले दाता की कोशिकाओं से कुछ टी-लिंफोसाइट को निकाला जा सकता है।

    जीवीएचडी दो प्रकार के होते हैं:

    गंभीर

    जीवीएचडी को गंभीर तब वर्गीकृत किया जाता है जब यह ट्रांसप्लांटेशन के बाद पहले 100 दिनों के अंदर होता है। रोग आमतौर पर जिगर, जठरांत्रीय मार्ग और त्वचा को प्रभावित करता है। बिलीरुबिन के ऊंचे स्तर के कारण गंभीर जीवीएचडी के लक्षणों में चकत्ते, दस्त, पीली त्वचा और आंखें शामिल हैं।

    क्रॉनिक

    क्रॉनिक जीवीएचडी आमतौर पर प्रत्यारोपण के लगभग तीन महीने बाद होता है, हालांकि कुछ मामलों में हो सकता है कि प्रत्यारोपण के एक साल बाद या इससे अधिक समय तक इसका विकास न हो। यह प्रत्यारोपण के बाद 10-40 प्रतिशत रोगियों में होता है। 

    ये लक्षण गंभीर जीवीएचडी की तुलना में अधिक व्यापक रूप से अलग होते हैं और कुछ ऑटोइम्यून विकारों के समान होते हैं। क्रॉनिक जीवीएचडी हल्के, मध्यम या गंभीर हो सकते हैं।

    लक्षणों में निम्न शामिल हैं:

    • चकत्ता और खुजली
    • त्वचा पर पपड़ी पड़ना
    • त्वचा उखड़ना
    • त्वचा का काला पड़ना
    • त्वचा की बनावट का सख्त होना
    • त्वचा का झुलसना, जिससे पास के जोड़ों की गति कम हो सकती है, जैसे कि उंगलियों का हिलना-डुलना बंद होना
    • बाल झड़ना
    • मुंह और भोजन-नली में सूखापन और घाव
    • सूखी आंखें और आंखों में लालिमा
    • योनि और अन्य सतहों का सूखापन
    • फेफड़ों का सूखना और घाव
    • जिगर की चोट या जिगर फ़ेल होना
    • पीलिया
  1. प्रत्यारोपण की तैयारी में इस्तेमाल की जाने वाली कीमोथेरेपी और रेडिएशन से म्यूकोसाइटिस हो सकता है, जो मुंह के घावों, ग्रासनलीशोथ (निगलने में परेशानी), पेट में अल्सर या दस्त के साथ पेट में ऐंठन जैसे लक्षणों के साथ जठरांत्रीय मार्ग में घाव करता है। कभी-कभी रोगियों को पोषण आहार लेने के लिए, नसों में दर्द की दवाओं और कुल अभिभावकीय पोषण (TPN) या नासोगैस्ट्रिक ट्यूब लगानी पड़ती है।

  2. संक्रमण जटिलताएं सबसे गंभीर दुष्प्रभावों में से एक हैं। एलोजेनिक दाता कोशिका (संबंधित या असंबंधित दाता) प्राप्त करने वाले लगभग 30 प्रतिशत रोगियों में जानलेवा संक्रमण हो सकता है। ऑटोलॉगस (रोगी की स्वयं की कोशिका) प्रत्यारोपण वाले रोगियों में ऐसा कम ही होता है। रोगियों नियमित रूप से जांच की जाएगी और संक्रमण की संभावना को कम करने के लिए दवा दी जाएगी। एलोजेनिक प्रत्यारोपण वाले रोगियों को विशेष आहार दिया जाएगा। कुछ मामलों में, जटिलताओं की पहचान और इलाज के लिए सर्जिकल प्रक्रियाओं की आवश्यकता हो सकती है।

  3. एक लाल, ऊबड़ खाबड़ दाने जिसमें गर्दन, कान, धड़, हथेलियां और तलवे शामिल हो सकते हैं। इससे फफोले बन सकते हैं। गंभीर मामलों में, त्वचा छिल जाएगी। त्वचा में बहुत खुजली हो सकती है। इलाज आमतौर पर प्रेडनिसोन जैसे स्टेरॉयड होते हैं।

  4. पेट की समस्याओं में पेट में दर्द, गंभीर दस्त, भूख में कमी और जी मिचलाना/ उल्टी हो सकती है।

  5. सबसे आम गंभीर जिगर की जटिलता वेनो-ओक्लूसिव बीमारी वीओडी रोग है। जिन रोगियों को पहले जिगर की चोट लगी हो, हेपेटाइटिस हुआ हो या एक उच्च जोखिम वाला विकार हो, उन्हें वीओडी का सबसे ज़्यादा खतरा होता है, हालांकि ये रोग प्रत्यारोपण के बाद किसी भी रोगी में विकसित हो सकता है। वीओडी में बिलीरुबिन की उच्च सांद्रता से (जिसके परिणामस्वरूप त्वचा और आंखों में पीलापन आ जाता है), जिगर बढ़ सकता है और तरल अवरोधन हो सकता है या वजन बढ़ सकता है। वीओडी को अक्सर तरल अवरोधन और डिफ़ीब्रोटाइड नामक दवा के साथ ठीक किया जाता है। जब रोगी अस्पताल में भर्ती रहता है, तब निवारक उपायों में रोगी को उर्सोडिओल या हेपरिन दी जा सकती है और वजन और द्रव संतुलन की दैनिक निगरानी शामिल की जा सकती है। वीओडी बहुत बुरा हो सकता है और सबसे खराब मामलों में, इससे मौत हो सकती है।

  6. कीमोथेरेपी के कारण या ग्राफ्ट वर्सेज होस्ट डिसीज़ के परिणामस्वरूप प्रत्यारोपण इकाई में भर्ती होने के कई सप्ताह बाद बाल झड़ना शुरू हो सकता है। यह कुछ दिनों में धीरे-धीरे होता है।

  7. कुछ कीमोथेरेपी दवाओं से दौरे पड़ सकते हैं। ऐसे रोगियों को दौरे को रोकने के लिए दवा दी जा सकती है।

  8. दर्द एक और समस्या है। म्यूकोसिटिस (मुंह के छाले) बहुत दर्दनाक हो सकते हैं। जीवीएचडी को रोकने या इलाज के लिए दिए गए साइक्लोस्पोरिन और अन्य दवाओं से नस में दर्द हो सकता है। दर्द निवारक दवाएं और गैर-चिकित्सा इलाज दर्द को कम कर सकते हैं और रोगियों को दर्द को बर्दाश्त करने में मदद कर सकते हैं।

  9. न्यूमोनिटिस या फेफड़ों की सूजन कीटाणु, विषाणु या फफूंदी के कारण हो सकती है। साइटोमेगालोवायरस (CMV) जैसे कुछ संक्रमणों को रोकने के लिए रोगियों को बारीकी से और संभावित निवारक दवा दी जाती है।

  10. थकान एक आम दुष्प्रभाव है। रोगियों को नियमित रूप से व्यायाम करना चाहिए, अक्सर आराम करना चाहिए और पौष्टिक भोजन खाना चाहिए।

चिकित्सक को कब बुलाएं?

देखभालकर्ता को रोगी के स्थानीय चिकित्सक या उनकी प्रत्यारोपण इकाई के चिकित्सक या नर्स प्रैक्टिशनर को तुरंत कॉल करना चाहिए, अगर रोगी में निम्न में से एक या अधिक लक्षण दिखाई देते हैं:

  • बुखार - माता-पिता को केंद्र के दिशानिर्देशों के हिसाब से देखते रहना चाहिए कि बच्चे को बुखार तो नहीं है। बुखार के दिशा-निर्देश हर केंद्र के लिए अलग-अलग होते हैं
  • चिकनपॉक्स, दाद, खसरा, रूबेला (जर्मन खसरा) या हेपेटाइटिस के संपर्क में आना
  • चकत्ता या खुजली
  • उभार, पीली त्वचा, रक्तस्राव या लाल चिकत्ता में वृद्धि (त्वचा पर बैंगनी-लाल धब्बे)
  • मुंह के छाले
  • सांस लेने में तकलीफ
  • कान का दर्द, गले में खराश, सर्दी या फ्लू
  • जी मिचलाना, उल्टी या वजन में कमी
  • लगातार सिरदर्द
  • बेहोशी
  • नींद से जागने में कठिनाई
  • हालत में बड़ा बदलाव

भावनात्मक प्रभाव

शारीरिक दुष्प्रभावों और परिवार, दोस्तों और सामान्य दिनचर्या से अलग होने के कारण, रोगियों में उदासी या अवसाद हो सकता है। एक या दो दिन उदास महसूस करना ठीक है, लेकिन अगर ये भावनाएं लंबे समय तक रहती हैं तो रोगियों को अपनी देखभाल टीम के सदस्य से बात करनी चाहिए। यह उनके चिकित्सक या नर्स या शायद उनके सामाजिक कार्यकर्ता, चैपलिन (पादरी), मनोविज्ञानी (साइकोलॉजिस्ट) या शिशु जीवन विशेषज्ञ हो सकते हैं।

देरी से दिखाई देने वाले प्रभाव

प्रत्यारोपण से जुड़ी कुछ समस्याओं को देरी से प्रभाव के रूप में जाना जाता है, क्योंकि वे इलाज के कई महीनों या वर्षों बाद तक स्पष्ट नहीं होती हैं। उनमें से अधिकांश समय के साथ सही हो जाती हैं, लेकिन अन्य स्थायी हो सकती हैं और उनपर लंबे समय तक ध्यान देना पड़ता है।

प्रत्यारोपण के देरी से दिखाई देने वाले प्रभाव में ये शामिल हो सकते हैं:

कोई भी इन सभी समस्याओं का अनुभव नहीं करता है। प्रत्यारोपण के बाद समस्याओं के विकास का जोखिम इस बात पर निर्भर करेगा कि आपकी बीमारी कौनसी है, आपका प्रत्यारोपण कैसा था, आपकी उम्र क्या है और पूर्व इलाज का इतिहास क्या है। उचित स्क्रीनिंग और निवारक उपायों के साथ कई जटिलताओं को रोका जा सकता है। नियमित तौर पर चिकित्सक से मिलना बहुत महत्वपूर्ण है।

दुष्प्रभाव मौजूद हैं या नहीं यह निर्धारित करने के लिए प्रत्यारोपण के बाद लंबे समय तक रोगियों की जांच की जाती है। प्रत्यारोपण के लिए तैयार होने के लिए जिन रोगियों के पूरे शरीर में रेडिएशन हुआ था उनमें अंतःस्रावी या एंडोक्राइन (ग्रंथि) समस्याओं का खतरा होता है जैसे, हाइपोपैरैथायराइडिज्म, एड्रिनल अपर्याप्तता या वृद्धि हार्मोन अपर्याप्तता। यह महत्वपूर्ण है कि रोगी की ऊंचाई और वजन नियमित रूप से दर्ज किया जाए और अगर आवश्यक हो, तो किसी एंडोक्राइन विशेषज्ञ की निगरानी में रहें।

रिलैप्स - अगर कैंसर लौटता है

कुछ मामलों में, प्रत्यारोपण के बाद कैंसर वापस (रिलैप्स) आ सकता है। प्रत्यारोपण के बाद पहले साल में रिलैप्स सबसे आम है और जैसे-जैसे समय बीतता है जोखिम कम होता जाता है। प्रत्यारोपण टीम आपकी देखभाल करना जारी रखेगी और अन्य इलाज विकल्पों पर चर्चा करेगी। इनमें बीमारी का परीक्षण या कोई अन्य प्रत्यारोपण शामिल हो सकता है।


समीक्षा की गई: जून 2018