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नॉन-हॉजकिन लिंफोमा

नॉन-हॉजकिन लिंफोमा क्या है?

नॉन-हॉजकिन-लिंफोमा हॉजकिन लिंफोमा को छोड़कर सभी प्रकार के बाकी लिंफोमा के लिए एक नाम है. लिंफोमा कैंसर का ऐसा प्रकार है जिसकी शुरुआत शरीर के लसिका तंत्र में होती है, जो कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली का एक भाग है.

लसिका तंत्र पूरे शरीर में लिंफोसाइट्स नामक संक्रमण से लड़ने वाली सफेद रक्त कोशिकाओं को स्थानांतरित करता है. जिसके परिणामस्वरूप, लिंफोमा कई जगहों पर शुरू हो सकता है, जिनमें शामिल हैं: 

  • लिंफ नोड्स
  • थायमस ग्लैंड
  • तिल्ली
  • पेट
  • जिगर
  • बोनमैरो
  • त्वचा
  • हड्डियां

बचपन में होने वाले अधिकांश नॉन-हॉजकिन लिंफोमा वयस्कों में होने वाले लिंफोमा से भिन्न होते हैं. बचपन में होने वाले लिंफोमा आमतौर पर अधिक आक्रामक होते हैं, लेकिन वे अत्यधिक उपचारयोग्य होते हैं.

बच्चों और किशोरों में होने वाला नॉन-हॉजकिन-लिंफोमा कितना पाया जाता है?

हर साल लगभग 800 अमेरिकी और 3000 भारतीय बच्चे और किशोरों में नॉन-हॉजकिन-लिंफोमा पाया जाता है।

इस चित्र में एक लड़के के लसिका तंत्र के नामांकित अंग दिखते हैं: सर्वाइकल नोड्स, लिंफ वाहिकाएं, एक्सिलरी नोड्स, इंग्युइनल नोड्स, तिल्ली, थायमस और टॉन्सिल.

प्रतिरक्षा प्रणाली के भाग के रूप में, लसिका तंत्र पूरे शरीर में संक्रमण से लड़ने वाली सफेद रक्त कोशिकाओं को स्थानांतरित करता है.

नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के कई अलग-अलग प्रकार हैं. बचपन में होने वाले नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के प्रकारों में निम्न शामिल हैं:

  1. बर्किट लिंफोमा बी लिंफोसाइट्स का एक आक्रामक (तेजी से बढ़ने वाला) विकार है. यह पेट, टॉन्सिल्स, अंडकोष, हड्डी, बोनमैरो, त्वचा या केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में हो सकता है.

    बर्किट लिंफोमा के मुख्य तीन प्रकार हैं: स्पोराडिक, एंडेमिक और इम्यूनोडिफिशियेंसी संबंधित.

    • स्पोराडिक बर्किट लिंफोमा दुनियाभर में होता है.
    • एंडेमिक बर्किट लिंफोमा अफ़्रीका में होता है.
    • इम्यूनोडिफिशियेंसी संबंधित लिंफोमा ज़्यादातर एड्स के रोगियों में देखा गया है.

    इसी बीमारी का एक अन्य रूप, बर्किट ल्यूकेमिया लिंफ नोड्स में बर्किट लिंफोमा के रूप में शुरू होकर बाद में खून और बोनमैरो में फैल जाता है. या यह पहले लिंफ नोड्स में फैले बिना भी खून और बोनमैरो में शुरू हो सकता है.

    बर्किट लिंफोमा का एक स्कैन

    बर्किट लिंफोमा

    बर्किट लिंफोमा का उपचार

    उपचार कुछ कारकों पर निर्भर करता है. इसमें कीमोथेरेपी दवाओं के संयोजन या रिटुक्सीमैब के साथ संयोजित कीमोथेरेपी शामिल हो सकते हैं.

    हाल ही में निदान किए गए

    हाल ही में निदान की गई बीमारी के लिए कीमोथेरेपी का योजना बनाते समय डॉक्टर कई कारकों को देखेगा और उनके आधार पर फैसला करेगा कि कितनी तेज दवाइयां देनी हैं, किस मात्र में और कब तक।

    इन कारकों में बीमारी कहाँ से शुरू हुआ कहाँ तक फैल गया है और   लैक्टेट डीहाइड्रोजिनेज (LDH) का स्तर भी शामिल होता है। बचपन में होने वाले बर्किट लिंफोमा के उपचार में आमतौर पर उपयोग की जाने वाली दवाओं के उदाहरण निम्न हैं: 

    • विन्क्रिस्टाईन
    • साइक्लोफॉस्फोमाइड
    • प्रेडनिसोन
    • डॉक्सोरूबिसिन
    • मैथोट्रैक्सेट
    • साइट्राबाइन
    • इटॉप्साइड

    कुछ रोगियों को रिटुक्सीमैब भी मिल सकती है. कितनी देर तक दवा चलेगी जोखिम कारकों पर निर्भर है, लैकिन आमतौर 3 से 8 महीने तक चलता है।

    रिलैप्स्ड (कैंसर वापिस आना)

    रिलैप्स्ड बीमारी का उपचार आमतौर पर बोनमैरो प्रत्यारोपण के बाद कीमोथेरेपी और रिटुक्सीमैब के साथ किया जाता है. एक सामान्य कीमोथेरेपी योजना जिसका उपयोग रिलैप्स्ड बीमारी के लिए किया जाता है, वह है RICE (रिटुक्सीमैब, इफोस्फामाइड, कार्बोप्लाटिन और इटॉप्साइड). वर्तमान में नई लक्षित थेरेपी रणनीतियों की जांच की जा रही है.

    रिलैप्स्ड बर्किट लिंफोमा के उपचार में स्टेम सेल प्रत्यारोपण शामिल हो सकता है.

    रिलैप्स्ड बर्किट लिंफोमा के उपचार में स्टेम सेल प्रत्यारोपण शामिल हो सकता है.

    बर्किट लिंफोमा का पूर्वानुमान

    पूर्वानुमान कुछ कारकों पर निर्भर है जैसे कि बीमारी कहाँ से शुरू हो कर कहाँ तक फैल गया है और लैक्टेट डीहाइड्रोजिनेज (एलीएच) का स्तर क्या है। लिंफोमा से पीड़ित कुछ रोगियों में स्तर सामान्य से अधिक होते हैं. सीमित स्टेज (स्टेज I और II) वाले बचपन में होने वाले बर्किट लिंफोमा के लिए पांच-साल तक जीवित रहने की दर 90 प्रतिशत से अधिक होती है.

    अधिक उन्नत (स्टेज III या IV) वाले बचपन में होने वाले बर्किट लिंफोमा के लिए पांच-साल तक जीवित रहने की दर की सीमा 80 से 90 प्रतिशत होती है.

  2. डिफ़्यूज लार्ज बी-सेल लिंफोमा आमतौर पर बच्चों की तुलना में किशोरों को अधिक बार होता है. यह बी-सेल नॉन-हॉजकिन लिंफोमा का एक ऐसा प्रकार है जो लिंफ नोड्स में तेज़ी से फैलता है. यह अक्सर स्प्लीन, लीवर, बोनमैरो या अन्य अंगों पर भी असर ड़ालता है.

    डिफ़्यूज लार्ज बी-सेल लिंफोमा का उपचार

    बचपन में होने वाले डिफ़्यूज लार्ज बी-सेल लिंफोमा का उपचार आमतौर पर बर्किट लिंफोमा के उपचार के समान ही होता है.

    डिफ़्यूज लार्ज बी-सेल लिंफोमा का पूर्वानुमान

    पूर्वानुमान बीमारी की स्टेज सहित कुछ कारकों पर निर्भर करता है.

    सीमित स्टेज (स्टेज I और II) वाले डिफ़्यूज लार्ज बी-सेल लिंफोमा के लिए पांच-साल तक जीवित रहने की दर 90 प्रतिशत से अधिक होती है.

    उन्नत (स्टेज III या IV) वाले डिफ़्यूज लार्ज बी-सेल लिंफोमा के लिए पांच-साल तक जीवित रहने की दर की सीमा 80 से 90 प्रतिशत होती है.

    डिफ़्यूज लार्ज बी-सेल लिंफोमा

    डिफ़्यूज लार्ज बी-सेल लिंफोमा

  3. प्राथमिक मीडियास्टिनल लार्ज बी-सेल लिंफोमा मीडियास्टिनम में बी सेल से विकसित होता है. यह फेफड़े और हृदय के आसपास की थैली सहित आसपास के अंगों में फैल सकता है. यह किडनी सहित लिंफ नोड्स और दूर के अंगों में भी फैल सकता है. बाल चिकित्सा के मामलों में, प्राथमिक मीडियास्टिनल बी-सेल लिंफोमा बड़े किशोरों में अधिक बार होता है.

    प्राथमिक मीडियास्टिनल लार्ज बी-सेल लिंफोमा का उपचार

    उपचार के विकल्प कुछ कारकों पर निर्भर करते हैं. बचपन में होने वाले प्राथमिक मीडियास्टिनल लार्ज बी-सेल लिंफोमा के लिए मुख्य उपचार कीमोथेरेपी और लक्षित थेरेपी (रिटुक्सीमैब) है.

    प्राथमिक मीडियास्टिनल लार्ज बी-सेल लिंफोमा का पूर्वानुमान

    बचपन में होने वाले प्राथमिक मीडियास्टिनल लार्ज बी-सेल लिंफोमा में 70 प्रतिशत बच्चे कैंसर-मुक्त रहते हैं. बेहतर उपचार दृष्टिकोणों की आवश्यकता होती है जिसमें नई लक्षित थेरेपी शामिल हो सकती है.

    प्राथमिक मीडियास्टिनल लार्ज बी-सेल लिंफोमा

    प्राथमिक मीडियास्टिनल लार्ज बी-सेल लिंफोमा

  4. लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा मुख्य रूप से टी-सेल लिंफोसाइट्स पर असर डालता है। यह आमतौर पर मीडियास्टिनम में होता है. लक्षणों में सांस लेने में तकलीफ़, घरघराहट, निगलने में परेशानी या सिर और गर्दन में सूजन शामिल हैं। यह लिंफ नोड्स, हड्डी, बोनमैरो, त्वचा, केंद्रीय तंत्रिका तंत्र, पेट के अंगों और अन्य भागों में फैल सकता है। लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा बहुत कुछ एक्यूट लिंफोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (ALL) की तरह ही होता है।

    लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा का उपचार

    लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा से पीड़ित बच्चों का उपचार करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाइयां और उपचार अनुसूची आमतौर पर एक्यूट लिंफोब्लास्टिक ल्यूकेमिया का उपचार करने के लिए विकसित परहेजों से ली गई हैं. आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले दवाईयों में विन्क्रिस्टाईन, प्रेडनिसोन, पेगास्पारगेज़ या इरविन एस्परगिनास, डूनोरूबिसिन, मैथोट्रैक्सेट, मर्कैप्टोप्यूरिन, साइट्राबाइन और साइक्लोफॉस्फोमाइड शामिल हैं. इलाज लगभग 2 साल चलती है.

    अगर कैंसर मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी तक फैल जाता है, तो उपचार में रेडिएशन और कीमोथेरेपी शामिल हो सकती है. बाल-चिकित्सा कैंसर विशेषज्ञ उपलब्ध शोध प्रोटोकॉल सहित उपचार विकल्पों की समीक्षा करेंगे. केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में प्रसार को रोकने के लिए विभिन्न दृष्टिकोणों के साथ कीमोथेरेपी रोग की पहचान के परीक्षण पर माता-पिता के साथ चर्चा की जा सकती है.

    बार-बार होने वाले लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा के उपचार में हेमेटोपोएटिक कोशिका प्रत्यारोपण (इसे बोनमैरो या स्टेम सेल ट्रांस्पलान्ट भी कहा जाता है) के साथ कीमोथेरेपी या उच्च-मात्रा वाली कीमोथेरेपी शामिल हो सकती है.

    लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा के उपचार में स्टेम सेल प्रत्यारोपण शामिल हो सकता है.

    लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा के उपचार में स्टेम सेल प्रत्यारोपण शामिल हो सकता है.

    लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा का पूर्वानुमान

    रोग का पूर्वानुमान बीमारी की स्टेज और कैंसर की अनुवांशिक बनावट सहित कुछ कारकों पर निर्भर करता है.

    गहन उपचार के साथ, सीमित स्टेज (स्टेज I या II) लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा वाले लगभग 90 प्रतिशत बच्चों को ठीक किया जा सकता है.

    अधिक उन्नत (स्टेज III या IV) लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा के लिए इलाज की दर आम तौर पर 80 प्रतिशत से अधिक होती है।

    लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा

    लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा

  5. एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा मुख्य रूप से टी-सेल लिंफोसाइट्स पर असर ड़ालता है। यह आमतौर पर लिंफ नोड्स, त्वचा या हड्डी में होता है और कभी-कभी पेट, फेफड़ों का अन्दर या बाहर और मांसपेशियों में हो जाता है।

    एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा का उपचार

    उपचार के विकल्प बीमारी की स्टेज और कैंसर के अनुवांशिक आधार सहित कुछ कारकों पर निर्भर करते हैं। एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा से पीड़ित बच्चों को अलग-अलग प्रकार के उपचार से उन्हें रोगमुक्त करने की कोशिश किया गया है। कीमोथेरेपी एजेंट जिनका आमतौर पर उपयोग किया जाता है उनमें शामिल हैं: 

    • साइक्लोफॉस्फोमाइड
    • डॉक्सोरूबिसिन
    • प्रेडनिसोन
    • विन्क्रिस्टाईन
    • मैथोट्रैक्सेट
    • साइट्राबाइन
    • इटॉप्साइड

    थेरेपी की कुल अवधि 4 से 12 महीनों की होती है.

    रिलैप्स्ड एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा के उपचार के विकल्प में कीमोथेरेपी, स्टेम सेल प्रत्यारोपण, बार-बार होने वाले एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा से पीड़ित बच्चों के लिए लक्षित थेरेपी (क्राइज़ोटिनिब) का रोग की पहचान का परीक्षण और ALK जीन में परिवर्तन, कीमोथेरेपी सहित क्राइज़ोटिनिब के साथ रोग की पहचान का परीक्षण या अन्य कैंसर रोधी दवा (एंटीबॉडी दवा संयुग्म जैसे ब्रेंटुसीमैब) जिसे अक्सर इम्यूनोथेरेपी कहा जाता है, से लिंक किए गए CD30 की एंटीबॉडी के साथ रोग की पहचान का परीक्षण शामिल होता है.

    एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा के उपचार का पूर्वानुमान

    एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा के लिए 5-साल तक घटना-मुक्त जीवित रहने की दर लगभग 70 प्रतिशत होती है.

    एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा

    एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा

नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के संकेत और लक्षण

बीमारी शरीर के किस भाग में शुरू हुई है इसके आधार पर संकेत और लक्षण भिन्न हो सकते हैं:

  • खांसी और सांस लेने में समस्या
  • पेट दर्द
  • जी मिचलाना
  • उल्टी होना
  • त्वचा का पीलापन
  • हड्डी में दर्द
  • त्वचा पर घाव होना

नॉन-हॉजकिन लिंफोमा रोग की पहचान

डॉक्टर बच्चे के लक्षणों के आधार पर और एक शारीरिक जांच, चिकित्सा इतिहास और रक्त की जांच के परिणामों पर विचार करके कैंसर का संदेह करना शुरू कर सकते हैं. कभी-कभी डॉक्टर कुछ रोग की पहचान करने वाली इमेजिंग जांच करवाने के लिए कहेंगे.

ये जांच स्थानीय डॉक्टर के कार्यालय, अस्पताल या किसी कैंसर केंद्र पर कराई जा सकती हैं.

  1. शारीरिक जांच और चिकित्सा इतिहास: बाल चिकित्सक के कार्यालय में, बच्चे की आमतौर पर शारीरिक जांच की जाएगी और चिकित्सा इतिहास मांगा जाएगा. शारीरिक जांच के दौरान, डॉक्टर बीमारी के संकेतों सहित स्वास्थ्य के सामान्य संकेतों की जांच करेगा, जैसे गाँठें या कुछ और जो असामान्य दिखे. आंख, मुंह, त्वचा और कानों को ध्यान से देखा जाएगा और एक तंत्रिका तंत्र परीक्षण किया जा सकता है. डॉक्टर बढ़े हुए स्प्लीन या लीवर के लक्षणों के लिए रोगी के पेट की जांच कर सकते हैं.

  2. रक्त की जांच में एक कंप्लीट ब्लड काउंट (सीबीसी) और ब्लड केमिस्ट्री अध्ययन शामिल हो सकता है। सीबीसी परीक्षण में लाल रक्त कोशिकाओं, सफेद रक्त कोशिकाओं, प्लेटलेट्स, हेमाटोक्रिट और हीमोग्लोबिन की मात्रा की जांच होती है। रक्त रसायन विज्ञान की पढ़ाई के दौरान, शरीर के अंगों और टिशू द्वारा निकले रक्त में मिलने वाले कुछ पदार्थों की मात्रा को मापने के लिए रोगी के रक्त के नमूने की जांच की जाती है। पदार्थ की सामान्य मात्रा से अधिक या कम होना बीमारी का संकेत कर सकती है।

  3. एक एक्स-रे में किसी व्यक्ति के शरीर के अंदर का चित्र लेने के लिए बहुत कम मात्रा में रेडिएशन का उपयोग किया जाता है. छाती वाले भाग का एक्स-रे, दिल, फेफड़े, लिंफ नोड्स, डायाफ्राम, रीढ़, पसलियों, कॉलरबोन और ब्रेस्टबोन को दिखाएगा.

बायोप्सी

कैंसर का संदेह होने पर डॉक्टर एक बायोप्सी करवाने के लिए कहता है. रोग की पहचान करने के लिए बायोप्सी की आवश्यकता होती है और यह निर्धारित करेगी कि लिंफोमा किस प्रकार का है. बायोप्सी के दौरान, संदेहजनक ट्यूमर से टिशू को निकालकर एक माइक्रोस्कोप में पैथोलॉजिस्ट द्वारा इसकी जांच की जाती है.

संदेहजनक कैंसर जहां हुआ है उसके आधार पर बायोप्सी के निम्न प्रकारों में से किसी एक को उपयोग में लाया जाता है:

  • एक्सिश्नल बायोप्सी: एक लिंफ नोड या टिशू की गांठ को हटाना.
  • इनसिश्नल बायोप्सी: एक गांठ, लिंफ नोड, या टिशू के नमूने का हिस्सा निकालना.
  • कोर बायोप्सी: एक बड़ी सुई का उपयोग करके टिशू या एक लिंफ नोड का हिस्सा निकालना.
  • बारीक-सुई वाली एस्पिरेशन बायोप्सी: एक पतली सुई का उपयोग करके टिशू या लिंफ नोड का हिस्सा निकालना. (एनसीआई)

अगर लिंफोमा कोशिकाएं मौजूद हैं, तो विशिष्ट प्रकार के लिंफोमा रोग की पहचान करने के लिए बायोप्सी करके निकाले गए टिशू की अतिरिक्त जांच की जाएगी. इन जांचों में शामिल हैं

  • इम्यूनोफिनोटायपिंग
  • सायटोजेनेटिक विश्लेषण
  1. नॉन-हॉजकिन लिंफोमा प्रतिरक्षा प्रणाली (बी लिंफोसाइट्स, टी लिंफोसाइट्स) की विभिन्न कोशिकाओं में पनपता है. 50% से अधिक लिंफोमा बी-लिंफोसाइट्स (बी-सेल लिंफोमा) के बढ़ने पर पनपता है. बाकी लिंफोमा टी-लिंफोसाइट्स (टी-सेल लिंफोमा) के बढ़ने पर पनपता है.

    इम्यूनोफेनोटाइपिंग का उपयोग कैंसर की कोशिकाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली की सामान्य कोशिकाओं से तुलना करके विशिष्ट प्रकार के लिंफोमा रोग की पहचान के लिए किया जाता है. इम्यूनोहिस्टोकेमिस्ट्री और फ्लो साइटोमेट्री विशिष्ट प्रकार के बी या टी-सेल लिंफोमा के रोग की पहचान करने के लिए उपयोग की जाने वाली लेबोरेट्री जांच हैं.

    इम्यूनोहिस्टोकेमिस्ट्री एक ऐसी जांच है जिसमें टिशू के एक नमूने में कुछ एंटीजन की जांच करने के लिए एंटीबॉडी का उपयोग किया जाता है. एंटीबॉडीज किसी माइक्रोस्कोप से देखने पर चमकने लगेंगी.

    फ्लो साइटोमेट्री में, कोशिकाओं को एक प्रकाश संवेदनशील डाई से रंगा जाता है इस डाई को एक तरल में डाला जाता है और धारा के रूप में किसी लेज़र या अन्य प्रकार के प्रकाश के सामने प्रवाहित किया जाता है. जांच में कोशिकाओं की संख्या, जीवित कोशिकाओं का प्रतिशत और कोशिकाओं की निश्चित विशेषताओं, जैसे आकार, आकृति और कोशिका की सतह पर ट्यूमर मार्करों की उपस्थिति को मापा जाता है. कोशिकाओं को एक प्रकाश संवेदनशील डाई से रंगा जाता है इस डाई को एक तरल में डाला जाता है और धारा के रूप में किसी लेज़र या अन्य प्रकार के प्रकाश के सामने प्रवाहित किया जाता है. माप इस बात पर आधारित होते हैं कि प्रकाश-संवेदनशील डाई प्रकाश के प्रति कैसे प्रतिक्रिया करती है.

  2. साइटोजेनेटिक विश्लेषण में लेबोरेट्री जांच शामिल होती हैं जो गुणसूत्रों में कुछ बदलावों को जांचती हैं.

    ऐसा ही एक परीक्षण है FISH (सीटू संकरण में प्रतिदीप्ति). इस जांच में कोशिकाओं और टिशू में जीन या गुणसूत्रों को जांचा जाता है. DNA के वे खंड जिनमें फ्लोरोसेंट डाई होती है, लेबोरेट्री में बनाए जाते हैं और फिर उन्हें कांच की स्लाइड पर कोशिकाओं या टिशू में मिलाया जाता है. जब DNA के ये खंड स्लाइड पर कुछ जीन या गुणसूत्रों के क्षेत्रों से जुड़ते हैं, तो वे एक विशेष प्रकाश के साथ माइक्रोस्कोप के नीचे देखे जाने पर चमकने लगते हैं. इस प्रकार के परीक्षण का उपयोग कुछ जीन परिवर्तनों को खोजने के लिए किया जाता है.

नॉन-हॉजकिन लिंफोमा की स्टेज का पता लगाना

अगर किसी बायोप्सी से कैंसर की पुष्टि होती है, तो डॉक्टर बीमारी की स्टेज का पता लगाने के लिए अधिक जांच कराएंगे. स्टेज बताती है कि क्या कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैल गया है और अगर ऐसा है तो कितनी मात्रा में और कितनी दूरी तक यह फैल चुका है.

कैंसर की स्टेज के आधार पर देखभाल टीम उपचार की योजना बनाती है. यह बहुत महत्वपूर्ण है कि लिंफोमा की स्टेज का जल्द से जल्द पता लगा लिया जाए क्योंकि इसके ट्यूमर तेज़ी से बढ़ते हैं. कैंसर की स्टेज जितनी अधिक होगी उतने ही आक्रमक तरीके से इसका उपचार करने की आवश्यकता होगी.

  • स्टेज 1 और स्टेज 2 वाले लिंफोमा को सीमित बीमारी माना जाता है
  • स्टेज 3 और स्टेज 4 वाले लिंफोमा को उन्नत स्टेज की बीमारी माना जाता है.
स्टेज जिसमें कैंसर का पता चलता है
स्टेज 1 लिंफ नोड्स के एक समूह में
लिंफ नोड्स के बाहर के एक हिस्से में
पेट या फेफड़ों के बीच की जगह में कोई कैंसर नहीं मिला
स्टेज 2 लिंफ नोड्स के बाहर के एक हिस्से में और लिंफ नोड्स के आस-पास
डायाफ्राम के ऊपर या नीचे दो या दो से अधिक क्षेत्रों में और पास के लिंफ नोड्स में फैल सकता है
पेट या आंतों में शुरू हो गया है और सर्जरी द्वारा पूरी तरह से हटाया जा सकता है. कैंसर कुछ नजदीकी लिंफ नोड्स में फैल गया हो सकता है.
स्टेज 3 डायाफ्राम के ऊपर कम से कम एक हिस्से में और डायाफ्राम के नीचे कम से कम एक हिस्से में
छाती में शुरू हो गया है
पेट में शुरू हो गया है और पूरे पेट में फैल गया है
रीढ़ की हड्डी के आसपास के हिस्से में
स्टेज 4 बोनमैरो में
मस्तिष्क में
मस्तिष्कमेरु द्रव में
शरीर के अन्य अंगों में.
यह उदाहरण नॉन-हॉजकिन लिंफोमा की हर स्टेज में बीमारी से प्रभावित हुए शरीर के हिस्सों को दिखाता है.

इमेजिंग जांच से रोग की पहचान

बाल रोगी में नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के प्रमाण वाला छाती का एक्स-रे.

बाल रोगी में नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के प्रमाण वाला छाती का एक्स-रे.

बीमारी के प्रमाण दर्शाता बच्चों को होने वाले नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के रोगी की छाती का एक्स-रे

बीमारी के प्रमाण दर्शाता बच्चों को होने वाले नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के रोगी की छाती का एक्स-रे.

बीमारी के प्रमाण के साथ बच्चों को होने वाले नॉन-हॉजकिन लिंफोमा का ऐक तरफ़ से एक्स-रे

बीमारी के प्रमाण के साथ बच्चों को होने वाले नॉन-हॉजकिन लिंफोमा का ऐक तरफ़ से एक्स-रे.

अतिरिक्त जांचें

बचपन में होने वाले नॉन-हॉजकिन लिंफोमा की स्टेज का पता लगाने में सहायता करने के लिए प्रदर्शित की जा सकने वाली जांच:

  1. एक बोनमैरो एस्पिरेशन और बायोप्सी यह निर्धारित कर सकती है कि लिंफोमा, बोनमैरो में फैला है या हड्डी में.

    बोनमैरो एस्पिरेशन: डॉक्टर कूल्हे की हड्डी में एक खोखली सुई डालकर बोनमैरो को निकाल देंगे. एक पैथोलॉजिस्ट कैंसर के संकेतों को देखने के लिए एक माइक्रोस्कोप से बोनमैरो को देखेगा.

    बोनमैरो बायोप्सी: कैंसर हड्डी में तो नहीं फैल गया है यह निर्धारित करने के लिए डॉक्टर बोनमैरो का एक छोटा सा ठोस हिस्सा निकाल देंगे. बायोप्सी को आमतौर पर एस्पिरेशन से ठीक पहले या बाद में किया जाता है.

    आमतौर पर प्रक्रिया के दौरान बच्चे सोए हुए (बेहोश) होते हैं या उन्हें उचित मात्रा में दर्द की दवा दी जाएगी.

  2. एक लंबर पंक्चर का उपयोग यह निर्धारित करने के लिए किया जाता है कि क्या लिंफोमा केंद्रीय तंत्रिका तंत्र में तो नहीं फैल गया है. रीढ़ की हड्डी से मस्तिष्कमेरु द्रव (CSF) एकत्रित करने के लिए इस प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है. इसे रीढ़ की हड्डी में और CSF के अंदर रीढ़ की हड्डी के चारों ओर दो हड्डियों के बीच में एक सुई डालकर और तरल का एक नमूना निकालकर किया जाता है.

    CSF के नमूने की एक माइक्रोस्कोप में जांच ऐसे संकेतों का पता लगाने के लिए की जाती है कि कहीं कैंसर मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में तो नहीं फैल गया. 

    इस प्रक्रिया को LP या स्पाइनल टैप भी कहा जाता है.

    रोगी या तो प्रक्रिया के दौरान सो रहे होते हैं या उन्हें सुन्न करने वाली दवा दी जाती है.

  3. मीडियास्टिनोस्कोपी और थौरैसेन्टेसिस ऐसी दो जांच हैं जिनका उपयोग सीमित मामलों में छाती के हिस्से में गहराई में बायोप्सी करने की आवश्यकता होने पर किया जा सकता है.

HIV (मानव इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस) के लिए एक स्क्रीनिंग जांच की भी सिफ़ारिश की जाती है क्योंकि लिंफोमा कभी-कभी इस वायरस के रोगियों में विकसित होता है. अगर जांच सकारात्मक आती है, तो रोगी को HIV के उपचार के लिए दवाओं की आवश्यकता हो सकती है.

नॉन-हॉजकिन लिंफोमा का उपचार

सर्वोत्तम उपचार का निर्धारण करते समय, डॉक्टर कई कारकों पर विचार करते हैं. इनमें शामिल है:

  • लिंफोमा का उपप्रकार
  • लिंफोमा की स्टेज
  • विभिन्न उपचारों पर प्रतिक्रिया देने की कितनी संभावना है
  • उपलब्ध उपचार प्रोटोकॉल

चिकित्सक और चिकित्सा टीम रोगी के बारे में कई कारकों पर भी विचार करेंगे, जिनमें उम्र भी शामिल है और यह भी कि क्या रोगियों की कोई मौजूदा स्थिति ऐसी है जो उपचार के लिए उनकी प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकती है.

उपचार इस बात पर आधारित होता है कि लिंफोमा का उपप्रकार आमतौर पर प्रारंभिक थेरेपी के लिए क्या प्रतिक्रिया देता है. इसे जोखिम-अनुकूलित थेरेपी कहा जाता है. जोखिम से तात्पर्य कैंसर के जोखिम से है जो उपचार का सफलतापूर्वक प्रतिसाद नहीं दे रहा है – कि यह या तो अच्छी तरह से प्रतिक्रिया नहीं देगा (रीफ्रैक्टरी) या कम होने के बाद फिर से वापस आएगा (रिलैप्स्ड).

जिन रोगियों में लिंफोमा का प्रकार आमतौर पर थेरेपी के प्रति कम प्रतिक्रियाशील होता है, उन्हें सामान्य जोखिम से अधिक जोखिम वाला माना जाता है. इन रोगियों को आम तौर पर अधिक गहन चिकित्सा दी जाती है.

लिंफोमा के ऐसे प्रकार वाले रोगी जिनमें प्रारंभिक थेरेपी के प्रति प्रतिक्रियाशील होने की संभावना होती है, उन्हें ऐसी दवाएं दी जाएंगी जिनके कम दुष्प्रभाव होने की संभावना है. सभी रोगियों को दुष्प्रभाव में सहायता करने के लिए दवाएं और अन्य थेरेपी दी जाती हैं.

बाल-चिकित्सा कैंसर विशेषज्ञ परिवार के साथ उपचार के विकल्पों के बारे में चर्चा करेंगे.

नॉन-हॉजकिन-लिंफोमा बच्चों में आक्रामक हो जाता है. यह महत्वपूर्ण है कि उपचार जल्द से जल्द शुरू हो.

  1. आमतौर पर परिपक्व बी-सेल नॉन-हॉजकिन लिंफोमा और एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा के लिए कीमोथेरेपी आवर्ती रूप से दी जाती है. रोगियों को कई हफ़्तों तक दवा मिलेगी और फिर एक और चक्र शुरू करने से पहले कुछ हफ़्तों तक आराम दिया जाएगा.

    लिंफोमा की स्टेज और रोगी के लक्षणों के प्रकार के आधार पर चक्रों की संख्या और उपचार की अवधि भिन्न हो सकती है.

    लिंफोब्लास्टिक लिंफोमा वाले रोगियों को दो साल की अवधि से अधिक समय तक निरंतर थेरेपी दी जाती है.

    बचपन में होने वाले लिंफोमा के लिए सामान्य कीमोथेरेपी की दवाओं में निम्न शामिल हैं:

    • विन्क्रिस्टाईन
    • साइक्लोफॉस्फोमाइड
    • प्रेडनिसोन
    • डॉक्सोरूबिसिन
    • मैथोट्रैक्सेट
    • साइट्राबाइन
    • इटॉप्साइड
  2. लक्षित थेरेपी कुछ एजेंट का उपयोग करती है जो कैंसर कोशिकाओं में होने वाले परिवर्तनों को लक्षित करते हैं जो कोशिकाओं को बढ़ने, विभाजित करने और फैलने में मदद करते हैं. लक्षित थेरेपी इन कोशिकाओं को निष्क्रिय कर देती है और कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से रोकती है.

    मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज, टायरोसिन किनेज इनहिबिटर और इम्यूनोटॉक्सिन थेरेपी के ऐसे तीन प्रकार हैं जो बचपन में होने वाले नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के उपचार में उपयोग किए जाते हैं या उपचार के अध्ययन में उपयोग किए जाते हैं.

    मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी

    मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी कैंसर का एक ऐसा उपचार है जो एक प्रकार की प्रतिरक्षा प्रणाली कोशिका से लेबोरेट्री में निर्मित एंटीबॉडीज का उपयोग करता है.

    ये एंटीबॉडी कैंसर की कोशिकाओं पर मौजूद पदार्थों या सामान्य पदार्थों की पहचान कर सकती हैं जिनसे कैंसर की कोशिकाओं को बढ़ने में मदद मिलती है. एंटीबॉडीज पदार्थों से जुड़ती हैं और कैंसर कोशिकाओं को मारती हैं, उनकी वृद्धि को रोकती हैं या उन्हें फैलने नहीं देती हैं. इनका उपयोग अकेले या दवा, टॉक्सिन या रेडियोएक्टिव सामग्री को सीधे कैंसर की कोशिकाओं में ले जाने के लिए किया जा सकता है.

    रिटुक्सीमैब एक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी है जिसका उपयोग कई प्रकार के बचपन में होने वाले नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के उपचार के लिए किया जाता है. (NCI)

    ब्रेंटुसीमैब एक मोनोक्लोनल एंटीबॉडी है जिसे एक ऐसी कैंसररोधी दवा के साथ मिलाया जाता है जिसका उपयोग एनाप्लास्टिक लार्ज सेल लिंफोमा का उपचार करने के लिए किया जाता है.

    टायरोसिन किनेज इनहिबिटर

    टायरोसिन किनेज इनहिबिटर (TKI) ऐसे संकेतों को अवरुद्ध कर देता है जिनके कारण ट्यूमर बढ़ता है.

    कुछ TKI ट्यूमर में नई रक्त वाहिकाओं के विकास को रोककर ट्यूमर को बढ़ने से भी रोकते हैं.

    क्राइज़ोटिनिब बचपन में होने वाले नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के लिए अध्ययन के अंतर्गत एक TKI है.

    इम्यूनोटॉक्सिन

    इम्यूनोटॉक्सिन कैंसर कोशिकाओं को बांध सकता है और उन्हें समाप्त कर सकता है. 

नॉन-हॉजकिन लिंफोमा जो प्रतिक्रिया नहीं करता है या वापस नहीं आता है

हालांकि लिंफोमा से पीड़ित बच्चों के उपचार में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, फिर भी 10-30% को रीफ्रैक्टरी या बार-बार होने वाली बीमारी होना जारी रहता है.

लेकिन उपचार के विकल्प मौजूद हैं. कई डॉक्टर एक हेमेटोपोएटिक कोशिका प्रत्यारोपण (इसे बोनमैरो प्रत्यारोपण या स्टेम सेल प्रत्यारोपण भी कहा जाता है) के बाद लक्षित थेरेपी के साथ उपचार या बिना उपचार के गहन कीमोथेरेपी पर विचार करते हैं.

लिंफोमा का उपप्रकार रोग के लिए उपचार का निर्णय लेने में एक महत्वपूर्ण कारक होता है.

नॉन-हॉजकिन लिंफोमा का पूर्वानुमान

रोग का पूर्वानुमान (ठीक हिने की संभावना) इन पर निर्भर करता है

  • लिंफोमा का प्रकार
  • पता चलने पर शरीर में ट्यूमर का स्थान
  • कैंसर की स्टेज
  • गुणसूत्रों में विशेष परिवर्तन होते हैं या नहीं
  • प्रारंभिक उपचार का प्रकार
  • लिंफोमा प्रारंभिक उपचार के लिए प्रतिक्रिया देता है या नहीं
  • रोगी की उम्र और सामान्य स्वास्थ्य

बचपन में होने वाले नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के लिए कुल मिलाकर पांच-साल तक जीवित रहने की दर लगभग 70% से लेकर 90% से अधिक तक हो सकती है.

नॉन-हॉजकिन लिंफोमा के उपचार के बाद देर से दिखाई देने वाले प्रभाव

देर से दिखाई देने वाले प्रभाव ऐसे दुष्प्रभाव होते हैं जो उपचार पूरा हो जाने के बाद बढ़ते हैं. इनमें शामिल है:

रोगियों को अपने चिकित्सकों के साथ सभी समस्या पर चर्चा करनी चाहिए और उन्हें सभी लक्षणों के बारे में बताना चाहिए. नियमित रूप से, ध्यान केंद्रित अनुवर्ती देखभाल बचपन में होने वाले कैंसर से बचे लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.

वर्तमान नॉन-हॉजकिन लिंफोमा अनुसंधान का फ़ोकस

  • वर्तमान में नई लक्षित थेरेपी रणनीतियों की जांच की जा रही है.
  • इम्यूनोथेरेपी जीवित रहने की दर को बेहतर बनाने के लिए अध्ययन के अंतर्गत है.
  • अनुसंधान थेरेपी के देर से दिखाई देने वाले प्रभाव जैसे बांझपन, हृदय संबंधी समस्याओं और दूसरी बार कैंसर होने में कमी और इनके उन्मूलन पर केंद्रित है.
  • बचपन में होने वाले लिंफोमा से जुड़ी गुणसूत्र संबंधी असामान्यताओं की निरंतर पहचान उपप्रकारों के वर्गीकरण को परिष्कृत करने, थेरेपी के प्रति प्रतिक्रिया का मूल्यांकन करने और नई थेरेपी को विकसित करने में मददगार साबित हो सकती है, जिसमें शामिल जीन या प्रोटीन को सीधे लक्षित किया जाता है.


समीक्षा की गई: जून 2019