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डिफ्यूज़ इंट्रिंसिक पोंटाईन ग्लिओमा (डीआईपीजी)

डीआईपीजी के अन्य नामों में निम्नलिखित शामिल हैं: डिफ्यूज़ मिडलाइन ग्लिओमा, एच3 के27एम-उत्परिवर्ती, ब्रेनस्टेम ग्लिओमा, पोंटाइन ग्लिओमा, पोंस का फैलना (इन्फ़िल्ट्रेटिंग) एस्ट्रोसाइटोमा, पोंस का ग्लिओब्लास्टोमा

डीआईपीजी क्या है?

डिफ्यूज़ इंट्रिंसिक पोंटाईन ग्लिओमा या डीआईपीजी, एक तेज़ी से फैलने वाला मस्तिष्क का कैंसर है जो मस्तिष्क के आधारिक भाग में विकसित होता है। डीआईपीजी ब्रेनस्टेम में, पोंस नामक भाग में शुरू होता है। पोंस जीवन की महत्वपूर्ण क्रियाओं को नियंत्रित करता है जिसमें संतुलन, श्वसन, मूत्राशय पर नियंत्रण, हृदय गति और रक्तचाप शामिल हैं। देखने, सुनने, बोलने, निगलने और गति संबंधी क्रियाओं को नियंत्रित करने वाली तंत्रिका नाड़ियां भी मस्तिष्क के इसी भाग से होकर गुज़रती हैं।

डीआईपीजी क्या है? डिफ्यूज़ इंट्रिंसिक पोंटाईन ग्लिओमा (डीआईपीजी) एक तेज़ी से फैलने वाला मस्तिष्क का कैंसर है जो ब्रेनस्टेम में पोंस नामक भाग में शुरू होता है। पोंस जीवन की महत्वपूर्ण क्रियाओं के साथ-साथ देखने, सुनने, बोलने, निगलने और गति संबंधी क्रियाओं को नियंत्रित करने वाली नसों के लिए ज़िम्मेदार होता है।

डिफ्यूज़ इंट्रिंसिक पोंटाईन ग्लिओमा (डीआईपीजी) एक तेज़ी से फैलने वाला मस्तिष्क का कैंसर है जो ब्रेनस्टेम में पोंस नामक भाग में शुरू होता है। पोंस जीवन की महत्वपूर्ण क्रियाओं के साथ-साथ देखने, सुनने, बोलने, निगलने और गति संबंधी क्रियाओं को नियंत्रित करने वाली नसों के लिए ज़िम्मेदार होता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका में हर वर्ष डीआईपीजी लगभग 200-300 बच्चों में पाया जाता है और उस हिसाब से भारत में यह कैंसर 500 से अधिक बच्चों में होता है। डीआईपीजी अक्सर 5-10 वर्ष की उम्र के बच्चों में होता है, लेकिन यह कभी-कभी छोटे बच्चों और किशोर उम्र के बच्चों में भी हो सकता है। डीआईपीजी वयस्कों में कम ही पाया जाता है।

डीआईपीजी ग्लायल सेल से बनता है, जो मस्तिष्क के सहायक ऊतक का निर्माण करती हैं। यह एक फैला हुआ ट्यूमर है, जिसका अर्थ है कि ट्यूमर पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है या नियंत्रित नहीं है। यह ट्यूमर उंगली जैसी शाखाओं के रूप में स्वस्थ ऊतकों के अंदर फैलता है। इस ट्यूमर के ब्रेनस्टेम में स्थित होने और फैलने की प्रकृति के कारण, सर्जरी से डीआईपीजी को सुरक्षित रूप से नहीं निकाला जा सकता।

डीआईपीजी का इलाज करना बहुत मुश्किल है। इस रोग की पहचान होने के बाद अधिकांश बच्चे 2 वर्ष से अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाते। वर्तमान में, डीआईपीजी का प्रमुख इलाज रेडिएशन थेरेपी है। हालांकि रेडिएशन अधिकांश रोगियों में अस्थायी रूप से लक्षणों में सुधार करता है, लेकिन यह इसका इलाज नहीं है। परिवार बीमारी के परीक्षणों पर विचार कर सकते हैं, जिसमें यह देखने के लिए नए इलाजों का परीक्षण किया जाता है कि परिणामों में सुधार लाया जा सकता है या नहीं।

परिवारों की लक्षणों को प्रबंधित करने और जीवन शैली को बढ़ावा देने में मदद करने के लिए प्रारंभिक प्रशामक देखभाल महत्वपूर्ण है।

डीआईपीजी लक्षण

डीआईपीजी ट्यूमर तेज़ी से बढ़ते हैं और इसके लक्षण आमतौर पर बहुत ही कम अवधि में (रोग की पहचान होने से लगभग 1 महीने पहले) विकसित होने लगते हैं। इसमें समस्याएं तेज़ी से प्रारंभ होती हैं और शीघ्रता से बढ़ती हैं। डीआईपीजी के संकेतों और लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:

  • संतुलन में कमी और चलने में समस्या
  • नेत्र संबंधी समस्याएं जैसे अस्पष्ट दिखना, दोहरा दिखना, पलकों का गिरना, अनियंत्रित नेत्र गति, आंख को पूरी तरह बंद न कर पाना, आंखें एक साथ एक दिशा में नहीं देख पाती हैं या तिरछी दिखती हैं (भेंगापन)
  • चेहरे पर कमज़ोरी या चेहरे का लटक जाना, आमतौर पर एक ही तरफ होता है
  • लार बहना या निगलने में समस्याएं
  • पैरों और बाजुओं में कमज़ोरी आना, आमतौर पर एक ही तरफ होता है
  • अनियमित गतिविधि या झटके लगना
  • असामान्य प्रतिवर्ती क्रियाएं
  • बहुत छोटे बच्चों में, पनपने में विफलता

कम सामान्य लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं:

  • जी मिचलाना और उल्टी होना
  • सिरदर्द, विशेषकर सुबह के समय जो अक्सर उल्टी के बाद बेहतर हो जाता है
  • व्यवहार संबंधी परिवर्तन, स्कूल संबंधी समस्याएं, चिड़चिड़ापन या रात में हँसना (नाइट लाफ़्टर)

डीआईपीजी में लक्षणों और तंत्रिका समस्याओं का परीक्षण

डीआईपीजी के तीन लक्षण

डीआईपीजी से पीड़ित बच्चों में अक्सर तीन लक्षणों का समूह पाया जाता है, जिसे डीआईपीजी के तीन लक्षण के रूप में जाना जाता है। लगभग 1/3 रोगियों में रोग की पहचान होने पर सभी तीनों लक्षण पाए जाते हैं, और अधिकांश रोगियों में इनमें से कम से कम एक लक्षण विकसित होता है:

  1. संतुलन और समन्वय में समस्याएं (गतिभंग)
  2. बाजुओं और पैरों में कमज़ोरी, झटके लगना और असामान्य प्रतिवर्ती क्रियाएं (लॉन्ग ट्रैक्ट संकेत)
  3. सिर, चेहरे और आंखों की मांसपेशियों और संवेदना को नियंत्रित करने वाली नसों में समस्याएं होने के कारण चेहरे की कमज़ोरी या पलकों का गिरना या असामान्य नेत्र गतिविधि (कपाल तंत्रिका विकार या न्यूरोपैथी)

कपाल तंत्रिकाओं से संबंधित समस्याएं

कपाल तंत्रिकाएं, मस्तिष्क से निकलने वाली तंत्रिकाओं के 12 जोड़े हैं। कपाल तंत्रिकाएं 5, 6 और 7, जो कि पोंस में उत्पन्न होती हैं, डीआईपीजी से प्रभावित हो सकती हैं। इन तंत्रिकाओं में से प्रत्येक से विशिष्ट समस्याएं जुड़ी हो सकती हैं:

कपाल तंत्रिका 5: चेहरे या मुंह के भागों में संवेदनशीलता खत्म हो जाना या उनका सुन्न हो जाना।

कपाल तंत्रिका 6: असामान्य नेत्र गतिविधि जैसे आंख के किनारे की ओर न देख पाना या आंखों का तिरछापन जिसमें आंखें नाक की ओर केंद्रित होती हैं।

कपाल तंत्रिका 7: चेहरे पर कमज़ोरी, विशेषकर मुंह पर और पलकों पर।

डीआईपीजी में कपाल तंत्रिका 6 और 7 की समस्याएं सबसे आम हैं। कभी-कभी अन्य कपाल तंत्रिकाएं भी क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। यदि ट्यूमर पोंस क्षेत्र के ऊपर के भाग (मध्य मस्तिष्क) में फैलता है, तो रोगियों में नेत्र गतिविधियों से संबंधित अतिरिक्त समस्याएं विकसित हो सकती हैं। यदि ट्यूमर पोंस के निचले भाग (मेड्यूला) में फैलता है, तो निगलने, और आवाज़ बदलने की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।

डीआईपीजी रोग की पहचान करना

चिकित्सक कई तरीकों से डीआईपीजी की जांच करते हैं। इन जाँचों में शामिल है:

  • शारीरिक जांच और चिकित्सा इतिहास से चिकित्सक को लक्षणों, सामान्य स्वास्थ्य, पिछली बीमारी और जोखिम कारकों के प्रकार व समयावधि के बारे में जानने में मदद मिलती है।
    • वर्तमान में डीआईपीजी का कोई कारण ज्ञात नहीं है। हालांकि, शोधकर्ता इन ट्यूमर से जुड़े वंशाणु परिवर्तनों के बारे में अधिक अध्ययन कर रहे हैं। न्यूरोफाइब्रोमैटोसिस टाइप 1 (एनएफ1) सहित, कुछ आनुवंशिक विकारों के होने से ब्रेनस्टेम ग्लिओमा का खतरा बढ़ सकता है।
  • तंत्रिका-सम्बंधित जाँच, स्मृति, देखने, सुनने, मांसपेशियों की ताकत, संतुलन, समन्वय और प्रतिवर्ती क्रियाओं सहित मस्तिष्क के कामों के विभिन्न पहलुओं को मापता है।
  • ट्यूमर की पहचान करने, ट्यूमर कितना बड़ा है यह देखने और मस्तिष्क के कौन से भाग प्रभावित हो सकते हैं यह पता लगाने में मदद के लिए इमेजिंग जांचों का उपयोग किया जाता है। मैग्नेटिक रेसोनेंस इमेजिंग (एमआरआई) वह प्रमुख इमेजिंग तकनीक है जिसका उपयोग डीआईपीजी का निदान करने के लिए किया जाता है।

चिकित्सक डीआईपीजी का निदान करने के लिए एमआरआई में ट्यूमर के प्रमुख लक्षणों की तलाश करते हैं:

  1. ट्यूमर पोंस में स्थित होता है।
  2. इसमें आमतौर पर पोंस का अधिकांश भाग शामिल होता है और यह अधिकांश भाग तक फैला हुआ होता है (इंट्रिंसिक या अन्तरस्थ)।
  3. ट्यूमर के किनारे पूर्णतः स्पष्ट नहीं होते। यह स्वस्थ ऊतकों में अंतःसंचरण करता है (फैला हुआ)।

बचपन में होने वाले मस्तिष्क के कैंसर में से लगभग 10-20% मस्तिष्क के कैंसर, ब्रेनस्टेम में पाए जाते हैं। जब कोई ट्यूमर ब्रेनस्टेम में विकसित होता है, तो वह आमतौर पर डीआईपीजी होता है। हालांकि, लगभग 20% ब्रेनस्टेम ट्यूमर कम श्रेणी के एस्ट्रोसाइटोमा होते हैं और उन्हें डीआईपीजी नहीं माना जाता है।

डीआईपीजी रोगी का एमआरआई स्कैन
डीआईपीजी रोगी का एमआरआई स्कैन

डीआईपीजी रोग की पहचान में बायोप्सी की भूमिका:

डीआईपीजी रोग की पहचान में कभी-कभी बायोप्सी का उपयोग किया जाता है। विगत समय में, आमतौर पर बायोप्सी का सुझाव नहीं दिया जाता था। हालांकि, अब यह आम होती जा रही है। बायोप्सी न करने के कारणों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • डीआईपीजी में अक्सर एमआरआई और बीमारी का मूल्यांकन करने पर दोनों में ही विशिष्ट लक्षण दिखाई देते हैं, इसलिए इसका निदान प्रायः बिना किसी अतिरिक्त जांच के किया जा सकता है।
  • ट्यूमर के स्थान के कारण बायोप्सी करने से नुकसान होने का जोखिम रहता है।
  • हो सकता है कि बायोप्सी से इलाज योजनाओं में परिवर्तन न किया जाए या इससे परिणाम प्रभावित न हों।

डीआईपीजी की जैविकी को समझने में बेहतर सर्जिकल तकनीकों और प्रगतियों के साथ, बायोप्सी की सलाह देना अधिक आम हो गया है। बायोप्सी के बाद, रोगविज्ञानी (पैथोलॉजिस्ट) ट्यूमर के विशेष प्रकार और श्रेणी का पता लगाने के लिए ऊतक के नमूने को माइक्रोस्कोप के नीचे रखकर उसकी जांच करेगा। आनुवंशिक परिवर्तनों या मार्कर के लिए भी ट्यूमर की जांच की जाएगी। ट्यूमर शरीरकोष विज्ञान (हिस्टोलॉजी) और आणविक लक्षणों को समझना डीआईपीजी के लिए एक दिन बेहतर इलाज प्रदान कर सकता है जैसे लक्षित इलाज और प्रतिरक्षा बढ़ाने का उपचार (इम्यूनोथेरेपी)।

डीआईपीजी का स्तर का पता लगाना और श्रेणीकरण

डीआईपीजी के लिए स्तर का पता लगाने की कोई मानक प्रणाली नहीं है। इलाज सुझाव इन दो प्रमुख कारकों पर आधारित होते हैं:

  1. यदि डीआईपीजी केवल ब्रेनस्टेम में पाया गया है या यदि यह मस्तिष्क या रीढ़ के अंदर की नस के अन्य दूरवर्ती भागों में फैल गया है (कैंसर फैला हुआ रोग)
  2. यदि डीआईपीजी की हाल ही में पहचान हुई या यह आरंभिक इलाज के बाद वापस हो गया है (वापस आने वाला रोग)

ग्लिओमा को माइक्रोस्कोप के नीचे ये कैसे दिखते हैं, इस आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। कोशिकाएं जितनी अधिक असामान्य दिखती हैं, उन्हें उतनी ही उच्च श्रेणी में रखा जाता है। श्रेणी I और II के ट्यूमर कम श्रेणी के ग्लिओमा माने जाते हैं। इसमें कोशिकाएं बिल्कुल सामान्य कोशिकाओं की तरह दिखती हैं और बहुत धीरे-धीरे बढ़ती हैं। श्रेणी III और IV के ट्यूमर उच्च-श्रेणी के ग्लिओमा माने जाते हैं। वे तेज़ी से फैलने वाले होते हैं व शीघ्रता से बढ़ते हैं और पूरी मस्तिष्क में फैल सकते हैं। डीआईपीजी ट्यूमर आमतौर पर उच्च-श्रेणी के होते हैं। बहुत ही कम होता है जब डीआईपीजी एक कम श्रेणी के ट्यूमर (श्रेणी II) के रूप में दिखाई देता है।

डीआईपीजी में H3 K27M उत्परिवर्तन

अधिकांश (लगभग 80%) डीआईपीजी ट्यूमर में, डीएनए में एक विशिष्ट उत्परिवर्तन या बदलाव पाया जाता है। यह उत्परिवर्तन H3 K27M के नाम से जाना जाता है। यह मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के मध्य भाग के अंदर गहराई में स्थित ट्यूमर में पाया जाता है जो फैला हुआ या अंतःसंचरण (इन्फ़िल्टरेटिव) वृद्धि को दर्शाते हैं। इस खोज ने पैथोलॉजी पर आधारित, डिफ्यूज़ मिडलाइन ग्लिओमा, H3 K27M-उत्परिवर्ती नामक एक नए रोग की पहचान के लिए मार्ग प्रशस्त किया है। ये ट्यूमर ज़्यादातर पोंस में होते हैं, लेकिन ये थेलेमस, रीढ़ के अंदर की नस और मस्तिष्क के अन्य मध्य भागों में भी हो सकते हैं।

बायोप्सी के बिना भी, यह माना जाता है कि अधिकांश डीआईपीजी ट्यूमर में H3 K27M उत्परिवर्तन होता है। यह तेज़ी से फैलने वाले ट्यूमर हैं। वे ट्यूमर जिनमें H3 K27M उत्परिवर्तन होता है, आमतौर पर उनके खराब परिणाम होते हैं भले ही फिर वे किसी भी श्रेणी के हों या माइक्रोस्कोप के नीचे कैसे भी दिखते हों।

डीआईपीजी पूर्वानुमान

दुर्भाग्य से, इस समय डीआईपीजी का कोई इलाज उपलब्ध नहीं है। इस रोग की पहचान के बाद 10% से भी कम बच्चे 2 वर्ष से अधिक समय तक जीवित रह पाते हैं। बहुत छोटी आयु के (3 वर्ष या उससे छोटी आयु के) रोगियों में और रोग की पहचान का मार्ग प्रशस्त करने वाले लंबी अवधि के लक्षणों वाले रोगियों में कुछ हद तक बेहतर परिणाम देखे जा सकते हैं। न्यूरोफ़ाइब्रोमैटोसिस टाइप 1 (एनएफ1) से पीड़ित रोगियों में डिफ्यूज़ ब्रेनस्टेम ट्यूमर भी रोग के साथ लंबे समय तक बने रह सकते हैं। हालांकि, डीआईपीजी में लंबे समय तक जीवित रहने की स्थिति को आमतौर पर असामान्य लक्षणों या गलत निदान से संबद्ध माना जाता है (ट्यूमर वास्तव में डीआईपीजी नहीं था)।

डीआईपीजी प्रगति

डीआईपीजी से पीड़ित अधिकांश रोगी रोग की पहचान से 2 वर्ष से अधिक समय तक जीवित नहीं रह पाते। अंतरराष्ट्रीय डीआईपीजी रजिस्टरी के हालिया अध्ययन के अनुसार, रोग की पहचान के समय से लेकर औसतन कुल उत्तरजीविता 11 महीने की थी। रोग की पहचान से लेकर ट्यूमर के विकसित होने का समय 7 महीने था। डीआईपीजी से पीड़ित केवल 10% रोगी ही 2 वर्ष से अधिक समय तक जीवित रह पाए थे और जीवित रहने की दर 5 वर्ष में 2% ही थी।

मूल रिपोर्ट का सार ऑनलाइन प्राप्त किया जा सकता है।

अधिकांश रोगियों में, रेडिएशन थेरेपी डीआईपीजी के लक्षणों को रोकने या धीमा करने में मदद करती है। लेकिन यह सुधार केवल थोड़े समय के लिए ही होता है। रेडिएशन ट्यूमर को संकुचित कर सकता है, लेकिन कुछ ही महीनों में यह फिर से बढ़ना शुरू हो जाता है। आरंभिक इलाज के बाद जब डीआईपीजी वापस होता है, तो यह रोग फिर आमतौर पर तेज़ी से बढ़ता जाता है और आगे के इलाज पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दर्शाता। अक्सर कुछ ही महीनों में रोगी की मृत्यु हो जाती है।

डीआईपीजी कई बार इलाज के पहले ब्रेनस्टेम के बाहर भी फैल सकता है। डीआईपीजी से पीड़ित लगभग 20% रोगियों में रोग की पहचान पर यह रोग मस्तिष्क या रीढ़ की हड्डी के दूरवर्ती भागों में या मस्तिष्कावरण में फैल चुका होता है। रोग फैलने के इस बाद के प्रकार को लेप्टोमेनिंजियल मेटास्टेसिस कहा जाता है। डीआईपीजी मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के अन्य भागों या मस्तिष्कावरण में भी फैल सकता है चूंकि इलाज के बाद यह रोग बढ़ता जाता है। लगभग 20% रोगियों में ट्यूमर विकास पर यह रोग दूरस्थ भागों में भी फैल चुका होता है।

डीआईपीजी इलाज

डीआईपीजी एक बहुत ही गंभीर कैंसर है। इसका वर्तमान में कोई इलाज उपलब्ध नहीं है। देखभाल का वर्तमान स्तर रेडिएशन थेरेपी पर आधारित है। डीआईपीजी रोगियों की अधिकतर देखभाल यथासंभव लक्षणों को नियंत्रित करने और जीवन शैली का समर्थन करने पर केंद्रित होती है। कॉर्टिकोस्टेरॉयड दवाइयां जैसे डेक्सामिथेसोन (डेकाड्रोन®) ट्यूमर से उत्पन्न होने वाले लक्षणों को कम करने में मदद कर सकती हैं। इन्हें आमतौर पर न्यूरोलॉजिक लक्षणों को प्रबंधित करने में मदद के लिए रोग की पहचान के समय और ट्यूमर विकास के समय उपयोग किया जा सकता है।

बहुत से बीमारी के परीक्षण ऐसे इलाजों की खोज कर रहे हैं जो डीआईपीजी से पीड़ित रोगियों के लिए परिणामों में सुधार ला सकते हैं।

  1. रेडिएशन थेरेपी डीआईपीजी का प्रमुख इलाज है। अधिकांश स्थितियों में, रेडिएशन बहुत ही कम समय के लिए ट्यूमर को सिकोड़ने या धीमा करने की प्रतिक्रिया प्रदान करता है। हालांकि, रेडिएशन थेरेपी लंबे समय तक इलाज प्रदान नहीं कर पाती है। यह लक्षणों में अस्थायी तौर पर आराम पहुंचा सकती है जिसका असर औसतन 6 महीने तक रहता है और जीवन अवधि को औसतन 3 महीने तक के लिए बढ़ा सकती है।

    अमेरिका के अधिकांश इलाज केंद्रों में, मानक सुझाव 6 से 7 सप्ताह की अवधि के लिए 54-60 Gy की खुराक सीमा के साथ स्थानीय रेडिएशन थेरेपी है। नए अध्ययनों से यह पता चला है कि हाइपोफ़्रैक्शनेटेड रेडिएशन थेरेपी रोगी और परिवार पर कम बोझ डाले बिना समान लाभ प्रदान कर सकती है। इस हाइपोफ़्रैक्शनेटेड विधि में कम समय में (आमतौर पर 3 सप्ताह में) रेडिएशन की अधिक खुराक दी जाती है।

    रेडिएशन का पहले से अधिक दिया जाना आमतौर पर कुछ समय के लिए रोग बढ़ने को रोकने में सहायक होता है। हाल ही में हुए अध्ययन दर्शाते हैं कि डीआईपीजी ट्यूमर में फिर से रेडिएशन देने की क्रिया को सफलतापूर्वक किया जा सकता है; हालांकि, जब रोग दोबारा होता है, तब ट्यूमर रेडिएशन के प्रति अधिक प्रतिरोधी हो जाता है और रेडिएशन के लाभ भी अधिक सीमित हो जाते हैं। जब दूसरी बार रेडिएशन दी जाती है, तो वह आमतौर पर 2 से 3 सप्ताह में दी जाती है।

  2. रेडिएशन थेरेपी के साथ कीमोथेरेपी का उपयोग किया जा सकता है यह देखने के लिए कि क्या इससे बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं। हालांकि, कीमोथेरेपी को डीआईपीजी में जीवनकाल या कुल उत्तरजीविता को बढ़ाने के योग्य नहीं पाया गया है। परिणामस्वरूप, कीमोथेरेपी सामान्य रूप से डीआईपीजी के मानक इलाज के भाग के रूप में नहीं दी जाती है।

    डीआईपीजी में अंतर्निहित आनुवंशिक परिवर्तनों में नई सूक्ष्म जानकारियों के साथ, बीमारी के परीक्षणों के माध्यम से अधिक ट्यूमर विशिष्ट इलाज प्रोटोकॉल की जांच की जा रही है। इसमें दवाओं के विभिन्न संयोजन और दवा देने की विधियां शामिल हैं।

    कीमोथेरेपी की संवहन-संवर्धित डिलीवरी

    रक्त-मस्तिष्क अवरोधक कुछ मस्तिष्क ट्यूमर के लिए कीमोथेरेपी की प्रभावशीलता को सीमित कर सकता है। यह सुरक्षात्मक अवरोधक, खून में मौजूद पदार्थों को मस्तिष्क में जाने से रोकने का कार्य करता है। यह मस्तिष्क के कैंसर में पहुंचने वाली दवाई की मात्रा को सीमित कर सकता है। इस समस्या से निपटने के लिए नई दवा वितरण तकनीकों की खोज की जा रही है। उनमें से एक विधि संवहन-संवर्धित वितरण (CED) है। इसमें सटीक सर्जरी द्वारा डीआईपीजी ट्यूमर वाले हिस्से में एक नली डालना शामिल है। इससे दवा एक अधिक नियंत्रित तरीके से सीधे ट्यूमर में ही पहुंचती है।

  3. ट्यूमर के स्थान की वजह से डीआईपीजी का इलाज करने के लिए सर्जरी का उपयोग नहीं किया जाता है। पोंस, मस्तिष्क का वह भाग जहां ट्यूमर होता है, जीवन की महत्वपूर्ण क्रियाओं के लिए ज़िम्मेदार होता है। इसलिए, ट्यूमर को सर्जरी के द्वारा नहीं निकाला जा सकता।

    सर्जरी का उपयोग हाइड्रोसिफ़लस (दिमाग में पानी आ जाना) के इलाज में मदद करने के लिए किया जा सकता है। चूंकि ट्यूमर के कारण पोंस फैल जाता है, जिससे वह मस्तिष्क और रीढ़ के अंदर की नस के आसपास के रीढ़ की हड्डी के पानी के प्रवाह को अवरुद्ध कर सकता है। इससे मस्तिष्क पर बहुत अधिक दवाब पड़ सकता है। डीआईपीजी के कारण हाइड्रोसिफ़लस (दिमाग में पानी आ जाना) से ग्रस्त कुछ बच्चों में मस्तिष्क से इस पानी को निकालने के लिए शंट लगाया जाता है।

    कुछ स्थितियों में, ब्रेनस्टेम और रीढ़ के अंदर की नस पर दबाव को कम करने के लिए खोपड़ी के आधार में मौजूद हड्डी के कुछ हिस्सों को निकालने के लिए (विसंपीडन) सर्जरी का उपयोग किया जा सकता है।

  4. लक्षित इलाज, ट्यूमर के विशिष्ट लक्षणों जैसे वंशाणु और प्रोटीनों पर क्रिया करते हुए या उन पर लक्ष्य साधते हुए कार्य करती हैं। डीआईपीजी में बीमारी के परीक्षणों के भाग के रूप में अध्ययन की जा रहीं कुछ लक्षित इलाज में इनको लक्ष्य बनाना शामिल है:

    • डीआईपीजी में कोशिका सतह ग्राहियों (सेल सरफ़ेस रिसेप्टर) को समृद्ध या सक्रिय माना जाता है
    • अंतःकोशिकीय प्रोटीन जो कोशिका वृद्धि और ट्यूमर कोशिकाओं के अस्तित्व को नियंत्रित करते हैं
    • वे प्रोटीन जो क्षतिग्रस्त डीएनए की मरम्मत करते हैं वे डीआईपीजी में बदल सकते हैं, जो कैंसर कोशिकाओं को रेडिएशन और कीमोथेरेपी के प्रति अधिक प्रतिरोधी बना देते हैं
    • प्रोटीन जो विशिष्ट उत्परिवर्तन, एच3 के27एम से संबंधित वंशाणु अभिव्यक्ति को नियंत्रित करते हैं
  5. प्रतिरक्षा बढ़ाने का उपचार (इम्यूनोथेरेपी) इलाज का वह प्रकार है जो कैंसर कोशिकाओं की पहचान करने और उन पर हमला करने के लिए शरीर की खुद की प्रतिरक्षा प्रणाली का उपयोग करता है। अभी हाल ही में, डीआईपीजी से पीड़ित रोगियों में विभिन्न प्रकार की इम्यूनोथेरेपी की खोज की जा रही है। इसमें वे एंटीबॉडी शामिल हैं जो डीआईपीजी ट्यूमर से लड़ने के लिए रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली को सक्रिय कर सकती हैं। वैज्ञानिक यह भी अध्ययन कर रहे हैं कि क्या कोई वैक्सीन विशिष्ट प्रकार के H3 K27M उत्परिवर्तन वाली डीआईपीजी ट्यूमर कोशिकाओं को लक्षित करने में सक्षम हो सकती है।

डीआईपीजी से पीड़ित बहुत से रोगियों को बीमारी के परीक्षण के माध्यम से देखभाल प्राप्त होती है। रोगियों के लिए बीमारी के परीक्षण, रोग की पहचान के समय, रेडिएशन थेरेपी के पूरा होने पर लेकिन ट्यूमर के बढ़ने से पहले या ट्यूमर बढ़ने के बाद उपलब्ध होते हैं।

कई बार ऐसा भी समय आता है जब आरंभिक रेडिएशन थेरेपी के बाद ट्यूमर अस्थायी रूप से संकुचित हो जाता है। लक्षणों में सुधार आता है और रोगी अपनी सामान्य गतिविधियों के लिए घर जा पाते हैं। इसे कभी-कभी “हनीमून अवधि” के नाम से भी जाना जाता है। इस चरण का अनुमान लगाना बहुत कठिन है। इस समय के दौरान कुछ बच्चे बिल्कुल सामान्य हो जाते हैं। कुछ बच्चों में बिल्कुल भी सुधार नहीं होता। परिवार इस समय का उपयोग एक साथ मिलकर बिताने या परिवार के रूप में कुछ विशेष करने के लिए कर सकते हैं। इच्छा पूरी करने वाले संगठन अक्सर इसमें सहायता कर सकते हैं।

 

डीआईपीजी से पीड़ित बच्चों के लिए प्रशामक देखभाल

डीआईपीजी एक तेज़ी से बढ़ने वाला रोग है और इसके लक्षण समय के साथ और खराब होते जाते हैं। प्रशामक देखभाल यथासंभव लंबे समय तक जीवन शैली को बनाए रखने में मदद करती है। परिवारों को अपनी देखभाल टीम से बात करनी चाहिए कि आगे कौन सी समस्याएं आ सकती हैं और कौन से तरीके उनका प्रबंधन करने में मदद कर सकते हैं।

बाद के स्तर वाले डीआईपीजी के आम लक्षण

जब डीआईपीजी वापस आता है, तब इसके लक्षण तेज़ी से बढ़ सकते हैं। हालांकि, लक्षण और उनकी प्रगति व गंभीरता भिन्न-भिन्न हो सकती है। बाद के स्तर वाले डीआईपीजी के कुछ संकेतों और लक्षणों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • संतुलन और गतिवाही क्रियाओं का बिगड़ना, जिसके कारण अक्सर चलने में असमर्थता आती है और व्हीलचेयर की आवश्यकता पड़ती है
  • लगातार कमज़ोरी और पक्षाघात, अक्सर शरीर के एक तरफ
  • निगलने में कठिनाई होना, साथ ही एस्पिरेशन निमोनिया और सामान्य रूप से खाना नहीं खा पाने से संबंधित समस्याएं जिसमें खिलाने वाली नली की आवश्यकता पड़ती है
  • डेक्सामिथेसोन जैसी कॉर्टिकोस्टेरॉयड दवाओं के सेवन से वजन बढ़ना या चेहरे पर सूजन आना या फूलापन रहना
  • बोलने या बातचीत करने में समस्याएं
  • चिंता, चिड़चिड़ापन या घबराहट
  • उदासी की बीमारी और निराशा की भावनाएं
  • थकान या उनींदापन
  • नींद की समस्याएँ
  • दृष्टि-संबंधी परिवर्तन
  • सिरदर्द
  • जी मिचलाना और उल्टी होना
  • कब्ज
  • मूत्र में कमी, मूत्रावधारण
  • सांस लेने में कठिनाई
  • हृदय गति और रक्तचाप संबंधी समस्याएं
  • दौरे पड़ना
  • संभ्रम होना, बेहोशी में बड़बड़ाना
  • बेहोशी

दवाइयां दर्द, जी मिचलाना और उल्टी, चिंता और उदासी की बीमारी तथा ट्यूमर के बढ़ने के साथ-साथ विकसित होने वाली चिकित्सीय समस्याओं को नियंत्रित करने में मदद कर सकती हैं। कला थेरेपी, संगीत थेरेपी और अन्य अतिरिक्त चिकित्सा भी रोगियों और परिवारों की लक्षणों का प्रबंधन करने में मदद कर सकती हैं।

डीआईपीजी के कारण वजन क्यों बढ़ता है और चेहरे पर सूचन क्यों आ जाती है?

यह एक आम प्रश्न है। हालांकि, अधिकतर समय, ऐसा मात्र ट्यूमर के कारण ही नहीं होता। वजन बढ़ना, चेहरे पर सूजन आना और फूलापन रहना मुख्यतया डीआईपीजी के लक्षणों के प्रबंधन में मदद करने के लिए दी जाने वाली कॉर्टिकोस्टेरॉयड दवाओं की अधिक खुराकों के कारण होता है। मस्तिष्क के कैंसर के कारण द्रव और दवाब में वृद्धि हो सकती है। इस दवाब (हाइड्रोसिफ़लस) के कारण सिरदर्द, जी मिचलाना, कमज़ोरी और चलने से संबंधित समस्याओं जैसे लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। स्टेरॉयड दवाइयां जैसे डेक्सामिथेसोन मस्तिष्क की सूजन और दवाब को कम करती हैं। लेकिन इन दवाओं के दुष्प्रभाव भी हैं, विशेषकर जब इनकी उच्च खुराकें दी जाती हैं या इन्हें लंबे समय तक दिया जाता है।

कॉर्टिकोस्टेरॉयड से भूख बढ़ सकती है जिससे रोगी अधिक मात्रा में भोजन करते हैं और इससे उनका वजन बढ़ जाता है। इनके कारण शरीर के लिए इन द्रवों से छुटकारा पाना मुश्किल हो सकता है, जिससे सूजन आ सकती है। शरीर भी वसा को अलग-अलग तरीकों से जमा कर सकता है, जिसके कारण गाल फूल सकते हैं या “मून फ़ेस अथवा चेहरा गोल” हो सकता है। तेज़ी से वजन बढ़ने के कारण कई बार त्वचा पर स्ट्रेच मार्क या खिंचाव के निशान पड़ जाते हैं। कॉर्टिकोस्टेरॉयड के कारण रूप-रंग में आने वाला परिवर्तन रोगी और परिवार के लिए बहुत चिंताजनक हो सकता है। स्टेरॉयड इलाज के अन्य दुष्प्रभावों में बार-बार मनःस्थिति बदलना, चिड़चिड़ापन और मांसपेशियों का कमज़ोर होना शामिल है। दुष्प्रभाव होते हुए भी, ये दवाइयां मस्तिष्क के कैंसर से पीड़ित बहुत से रोगियों के लिए प्रशामक देखभाल और जीवन शैली का एक महत्वपूर्ण भाग हैं। परिवारों को दुष्प्रभावों और देखरेख के लक्ष्यों के बारे में अपनी देखभाल टीम से बात करनी चाहिए।

अमेरिकन मस्तिष्क के कैंसर एसोसिएशन में स्टेरॉयड के बारे में अधिक पढ़ें

हाइड्रोसिफ़लस (दिमाग में पानी आ जाना) के कारण सिरदर्द, जी मिचलाना, कमज़ोरी और चलने से संबंधित समस्याओं जैसे लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। स्टेरॉयड दवाइयां मस्तिष्क की सूजन और दवाब को कम तो कर सकती हैं, लेकिन इनके दुष्प्रभाव भी होते हैं। वजन बढ़ना, चेहरे पर सूजन आना और फूलापन रहना मुख्यतया कॉर्टिकोस्टेरॉयड दवाओं की अधिक खुराकों के कारण होता है।

हाइड्रोसिफ़लस (दिमाग में पानी आ जाना) के कारण सिरदर्द, जी मिचलाना, कमज़ोरी और चलने से संबंधित समस्याओं जैसे लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। स्टेरॉयड दवाइयां मस्तिष्क की सूजन और दवाब को कम तो कर सकती हैं, लेकिन इनके दुष्प्रभाव भी होते हैं। वजन बढ़ना, चेहरे पर सूजन आना और फूलापन रहना मुख्यतया हाइड्रोसिफ़लस का इलाज करने वाली कॉर्टिकोस्टेरॉयड दवाओं की अधिक खुराकों के कारण होता है।

 

देखभाल टीम के साथ कार्य करना

डीआईपीजी के खराब पूर्वानुमान के साथ, परिवारों के लिए यह आवश्यक है कि वे थेरेपी के लक्ष्यों, प्रशामक देखभाल और जीवन के अंत तक की देखभाल के बारे में अपनी देखभाल टीम से बात करें। ये बातचीत देखभाल प्रक्रिया के आरंभ में ही कर ली जानी चाहिए। देखभाल के लक्ष्य बीमारी के दौरान रोगी और परिवार की बदलती आवश्यकताओं के अनुसार बदलते रहते हैं।

डीआईपीजी के बढ़ने के अनुसार रोगी की विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा करने में मदद के लिए स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं की एक टीम का होना महत्वपूर्ण होता है। प्रशामक देखभाल और जीवन शैली सेवाएं रोगियों और परिवारों की दर्द और अन्य लक्षणों प्रबंधन करने में, जीवन शैली को बेहतर बनाने में और इलाज विकल्पों व जीवन के अंत तक की देखभाल सहित मुश्किल निर्णय करने में मदद करती हैं। मरणासन्न रोगियों के अस्पताल में की जाने वाले देखभाल जीवन की अंतिम सांसें गिन रहे रोगियों को चिकित्सीय और व्यावहारिक सहायता प्रदान करती है। पुनर्सुधार सेवाएं गतिवाही क्रियाओं, बोलने, सुनने या निगलने की समस्याओं के लिए देखभाल प्रदान करती हैं। बाल जीवन, सामाजिक कार्य, आध्यात्मिक देखभाल और मनोविज्ञान पूरे परिवार के लिए कैंसर यात्रा के दौरान भावनात्मक और व्यावहारिक ज़रूरतों को पूरा करने में मदद कर सकते हैं।

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समीक्षा की गई: नवंबर, 2019