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ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम क्या है?

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम (टीएलएस) एक गंभीर समस्या है, जो कैंसर के इलाज के शुरुआती चरणों के दौरान हो सकती है। जब कैंसर कोशिकाएं मर जाती हैं और अलग हो जाती हैं, तब वे पोटैशियम, फॉस्फोरस और न्यूक्लिक एसिड सहित पदार्थों को खून में छोड़ती हैं। इन पदार्थों के उच्च स्तर से मेटाबोलिक (चयापचयी) परिवर्तन होते हैं, जो हृदय, गुर्दे, जिगर और अन्य अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम जानलेवा हो सकता है और इसे कैंसर की बीमारी में आपातकाल स्थिति माना जाता है।

नॉन-हॉजकिन लिंफोमा या खून के कैंसर वाले मरीजों में ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम सबसे आम होता है। हालांकि, यह किसी भी तेजी से बढ़ने वाले कैंसर के इलाज में हो सकता है। यदि एंटी-कैंसर थेरेपी शुरू करने के बाद ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम आता है, तो यह आमतौर पर 1-3 दिनों के भीतर विकसित होता है। कैंसर कोशिकाओं के तेजी से बढ़ने के कारण इलाज शुरू होने से पहले ही कुछ मरीजों में ये मेटाबोलिक (चयापचयी) परिवर्तन हो सकते हैं। ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम जल्दी से बढ़ सकता है और तत्काल चिकित्सा देखभाल की आवश्यकता होती है। समस्या के कारण या शारीरिक लक्षणों के होने से पहले मेटाबोलिक (चयापचयी) परिवर्तनों को जानने के लिए और इलाज के लिए बार-बार खून की जांच की जाती है।

जिन मरीजों में कुछ ऐसे कैंसर के प्रकार होते हैं जैसे कि बर्किट लिंफोमा, एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (एएलएल), एक्यूट माइलोजेनस ल्यूकेमिया (एएमएल) या अन्य जोखिम कारकों की इलाज के पहले चरण में बारीकी से जांच की जाती है। प्रिवेन्टिव थेरेपी में फास्फोरस में वृद्धि को प्रबंधित करने के लिए यूरिक एसिड और लैंथेनम या एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड (Amphojel®) में वृद्धि का प्रबंधन करने के लिए हाइड्रेशन और दवाओं जैसे कि रैसबुरिकेस या एलोप्यूरिनॉल के लिए आईवी फ्लूइड शामिल हो सकते हैं।

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम रोग की पहचान करना

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम स्थायी रूप से अंग को नुकसान पहुंचा सकता है या यहां तक कि अचानक मौत का कारण भी बन सकता है। उच्च जोखिम वाले बच्चों पर कड़ी निगरानी रखी जाएगी।

खून की जांच करके ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम की पहचान की जाती है। चिकित्सक इन परिवर्तनों पर नज़र रखते हैं:

  • पोटैशियम का उच्च स्तर
  • यूरिक एसिड का उच्च स्तर
  • फॉस्फोरस का उच्च स्तर
  • कैल्शियम का कम स्तर

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम के लक्षण

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम के लक्षण शरीर में मेटाबोलिक (चयापचयी) असंतुलन के कारण होते हैं। ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम के जोखिम वाले बच्चों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है। ज़्यादातर मामलों में, लक्षणों के आने से पहले मेटाबोलिक (चयापचयी) असंतुलन का इलाज किया जाता है। हालांकि, ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम से जुड़े लक्षणों में ये शामिल हो सकते हैं:

  • जी मिचलाना
  • उल्टी होना
  • दस्त होना
  • भूख न लगना
  • दौरे पड़ना
  • हृदय की लय में बदलाव
  • मांसपेशियों में ऐंठन या मरोड़
  • बेहोशी
  • कमज़ोरी
  • थकान या सुस्ती
  • पेट या पीठ में दर्द
  • द्रव रोककर रखने की क्षमता, फुलाव या सूजन

इन लक्षणों में से कई कीमोथेरेपी के दुष्प्रभाव भी हो सकते हैं या अन्य कारण भी हो सकते हैं।

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम, खून में सेलुलर सामग्री के अचानक मुक्त होने के कारण होता है जिसके कारण शरीर में मेटाबोलिक (चयापचयी) असंतुलन का कारण बनता है। सामान्य परिस्थितियों में, शरीर द्वारा इस्तेमाल नहीं किए जा सकने वाले पदार्थ गुर्दे द्वारा खून से बाहर निकाले जाते हैं। अपशिष्ट को पेशाब के माध्यम से शरीर से बाहर निकाला जाता है। इससे शरीर को उसके रासायनिक संतुलन को बनाए रखने में मदद मिलती है। यदि कई कैंसर कोशिकाएं एक समय में मरती हैं, तो शरीर उन सभी पदार्थों को रखने में सक्षम नहीं हो सकता है, जो इनसे छुटकारा पाने के लिए ज़रूरी होते हैं और वे शरीर में बनना शुरू करते हैं। मेटाबोलिक (चयापचयी) बदलाव पूरे शरीर में समस्याएं पैदा कर सकते हैं।

मेटाबोलिक बदलाव शरीर पर प्रभाव
उच्च पोटैशियम (हाइपरक्लेमिया) हृदय के काम करने में बदलाव, मांसपेशियों की समस्या, थकान, दिल का दौरा, अचानक मौत
उच्च यूरिक एसिड (हाइपर्यूरिसीमिया) गुर्दे का घाव, गुर्दे का काम न करना
उच्च फॉस्फेट (हाइपरफोस्फेटेमिया) गुर्दे का घाव, मांसपेशियों में ऐंठन, दौरा, हृदय की समस्याएं
कैल्शियम की कमी (हाइपोकैल्सीमिया) जी मिचलाना, उल्टी, मांसपेशियों में ऐंठन, दौरे पड़ना, हृदय की समस्याएं, भ्रम

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम के जोखिम कारक

बच्चों में अक्सर कैंसर के प्रकारों में ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम से जुड़े बर्किट ल्यूकेमिया या लिंफोमा, एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (एएलएल) और क्रोनिक माइलॉयड ल्यूकेमिया (सीएमएल) से शामिल हैं।

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम के जोखिम कारकों में ये शामिल हैं:

  • तेज़ी से बढ़ने वाला कैंसर
  • कीमोथेरेपी पर जल्दी से प्रतिक्रिया देने वाला कैंसर
  • बड़ा कैंसर पिंड
  • कैंसर का उन्नत स्तर
  • हाई कैंसर होना

चिकित्सक ट्यूमर के आकार, सफेद रक्त कोशिका की गिनती, लैक्टेट डीहाइड्रोजिनेज (एलडीएच) स्तर और बोन मैरो (हड्डी के अंदर जहां खून बनता है) की भागीदारी का इस्तेमाल करके कैंसर के बोझ का मूल्यांकन करते हैं।

कुछ मरीजों की विशेषताओं से भी जोखिम बढ़ सकता है। इनमें शामिल है:

  • इलाज से पहले यूरिक एसिड या फॉस्फेट का उच्च स्तर
  • गुर्दे का ठीक से काम न करना
  • पेशाब का कम बनना
  • अम्लीय पेशाब
  • निम्न रक्त चाप
  • पानी की कमी
  • मध्यस्थानिका पिंड
  • बढ़ा हुआ प्लीहा

अक्सर इंटेन्सिव एंटीकैंसर थेरेपी की प्रतिक्रिया में ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम होता है। सिंड्रोम से जुड़े इलाजों में ये शामिल हैं:

  • संयोजन कीमोथेरेपी
  • कॉर्टीकोस्टेरॉयड्स
  • रेडिएशन थेरेपी

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम की रोकथाम और प्रबंधन

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम को रोकने और मेटाबोलिक (चयापचयी) असंतुलन के इलाज में मदद करने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं। आईवी जलयोजन (हाइड्रेशन) और दवा का इस्तेमाल ज़्यादा जोखिम में होने वाले बच्चों के लिए प्रतिबंधक इलाज के रूप में किया जाता है। कुछ मरीजों को आक्रामक तरीके से थेरेपी देने के पहले कम इंटेन्सिव कीमोथेरेपी को थोड़े समय के लिए दिया जाएगा, ताकि ट्यूमर लिसेस ज़्यादा धीरे-धीरे से हो। इससे इसे प्रबंधित करना आसान हो सकता है, शरीर को अपने रासायनिक संतुलन को बनाए रखने और गुर्दे खराब होने के कारण होने वाली क्षति को रोकने में मदद मिल सकती है। ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम के प्रबंधन में खून की जांच का निरीक्षण, स्पेसिफिक मेटाबोलिक (विशिष्ट चयापचयी) असंतुलन का इलाज करना और गुर्दे के काम में सहायता देना शामिल है।

प्रयोगशाला परीक्षण और लक्षण की निगरानी

विशेष रूप से इलाज के पहले सप्ताह के दौरान, ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम के ज़्यादा जोखिम वाले मरीजों का बारीकी से निरीक्षण किया जाना चाहिए। त्वरित चिकित्सा देखभाल शरीर पर जहर के प्रभाव को कम कर सकती है।

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम के निरीक्षण में इन्हें शामिल किया जाना चाहिए:

  • लक्षणों का आकलन
  • पेशाब इनपुट का मापन
  • पोटैशियम, फॉस्फेट, कैल्शियम, यूरिक एसिड, ब्लड यूरिया नाइट्रोजन (बीयूएन), क्रेटिनाइन और लैक्टेट डीहाइड्रोजिनेज की जांच के लिए प्रयोगशाला परीक्षण

निगरानी करने का शेड्यूल इस बात पर निर्भर करेगा कि मरीज को ज़्यादा, मध्यवर्ती या कम जोखिम माना जाता है अथवा नहीं।

जलयोजन के लिए आईवी फ्लूइड्स

आईवी फ्लूइड्स आमतौर पर रोगनिदान केंद्र पर शुरू किए जाते हैं और कीमोथेरेपी के माध्यम से चालू रखे जाते हैं। खून में रासायनिक असंतुलन को रोकने और गुर्दे के संचालन में सहायता के लिए पर्याप्त जलयोजन महत्वपूर्ण है। जिन मरीजों को पेशाब कम होती है, उन पर पैनी नज़र रखी जाएगी। कुछ मरीजों को पेशाब (मूत्रवर्धक) करने में मदद करने के लिए दवा की ज़रूरत हो सकती है या इतना ही नहीं खून को फिल्टर करने के लिए तब तक डायालिसिस हो सकता है, जब तक कि गुर्दा ठीक नहीं हो जाता है।

यूरिक एसिड को कम करने की दवाएं

बच्चों के ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम में ज़्यादा यूरिक एसिड (हाइपर्यूरिसीमिया) का इलाज करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं में एलोप्यूरिनॉल और रैसबुरिकेस शामिल हैं।

एलोप्यूरिनॉल, यूरिक एसिड के बनने को रोकता है। आमतौर पर मरीज कीमोथेरेपी शुरू होने से 2-3 दिन पहले एलोप्यूरिनॉल लेता हैं और इसे 10 से 14 दिनों तक लेना जारी रखता है। इसका मुख्य रूप से रोगनिरोधी दवाई के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

रैसबुरिकेस खून में यूरिक एसिड का रासायनिक परिवर्तन करने या उसे कम करने का काम करता है। यह तेजी से काम करता है और आमतौर पर 4 घंटे के भीतर काम करता है। उच्च यूरिक एसिड को रोकने या इसका इलाज करने के लिए रैसबुरिकेस का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, G6PD की कमी वाले मरीजों को यह दवाई नहीं लेनी चाहिए। एलोप्यूरिनॉल की तुलना में रैसबुरिकेस भी ज़्यादा महंगा इलाज है और हर जगह मौजूद नहीं होता है।

फॉस्फेट को कम करने के लिए दवाइयां

दवाइयां खून में फॉस्फेट के स्तर को कम करने के लिए दी जा सकती हैं। इन दवाओं को फॉस्फेट बाइंडर्स कहा जाता है, पाचन प्रणाली में फॉस्फेट को अवशोषित होने से रोकने के लिए उनसे जोड़ी जाती हैं। इन दवाइयों के उदाहरण में लैंथेनम और एल्यूमीनियम हाइड्रॉक्साइड (Amphojel®) शामिल हैं।

इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन का इलाज करना

मेटाबोलिक असंतुलन (ज़्यादा पोटैशियम, ज़्यादा फॉस्फेट और कम कैल्शियम) का इलाज अक्सर गुर्दे के संचालन की मदद से किया जा सकता है। हालांकि ये असंतुलन मरीजों के लिए तत्काल जोखिमपूर्ण हो सकता है और विशिष्ट इलाज की आवश्यकता हो सकती है। पर्याप्त जलयोजन (हाइड्रेशन) बनाए रखना बहुत ज़रूरी होता है। ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम के प्रबंधन के दौरान आईवी फ्लूइड्स से कुछ इलेक्ट्रोलाइट की खुराक को निकाल देना चाहिए।

गुर्दे की डायालिसिस

गुर्दा खराब होना, ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम की एक सामान्य समस्या होती है। ज़्यादा यूरिक एसिड गुर्दे की नलिकाओं, गुर्दे के छोटे क्षेत्रों में क्रिस्टल बनने का कारण हो सकता हैं जो खून को फ़िल्टर करने में मदद करता है। गुर्दे की सुरक्षा के लिए जलयोजन (हाइड्रेशन), मूत्रवर्धक का इस्तेमाल और एलोप्यूरिनॉल के साथ रोगनिवारण थेरेपी या रैसबुरिकेस के साथ हर कदम उठाया जाता है। हालांकि, पर्याप्त चिकित्सा देखभाल के बावजूद भी गुर्दे सही से काम करना बंद कर सकते हैं। गुर्दा ठीक होने तक खून को फ़िल्टर करने के लिए मरीजों को डायालिसिस की आवश्यकता हो सकती है। अधिकांश मरीजों के गुर्दे का संचालन समय के साथ धीरे-धीरे बेहतर हो जाएगा। हालांकि, कुछ मरीजों में ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम के बाद रोगनिवारण उपायों को अपनाने के बावजूद भी गुर्दे को स्थायी नुकसान हो सकता है।

ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम दुर्लभ होता है। हालांकि, यह गंभीर स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं पैदा कर सकता है। जोखिम वाले मरीजों पर कड़ी निगरानी रखी जाती है, ताकि मेटाबोलिक (चयापचयी) असंतुलन का इलाज किया जा सके। तरल पदार्थ का सेवन, आहार और दवाओं के निर्देशों का पालन करना ज़रूरी है। आपका चिकित्सक आपको ट्यूमर लिसेस सिंड्रोम को समझने में और यह जानने में मदद कर सकता है कि आपके बच्चे को खतरा है या नहीं। हमेशा किसी भी स्वास्थ्य संबंधी चिंता के बारे में अपनी देखभाल टीम से बात करें, और उन्हें इलाज के दौरान या बाद में लक्षणों में आने वाले परिवर्तनों के बारे में सूचित करें।


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समीक्षा की गई: दिसंबर 2018